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आध्यात्मिक: अच्छे कुल की स्त्रियों की पहचान

डेस्क न्यूज। महाभारत के वनपर्व के 70 वें अध्याय के 8 वें और 9 वें श्लोक में महाराज नल ने दमयन्ती के संदेशवाहक ब्राह्मण से अच्छे कुल की स्त्रियों का स्वभाव बताते हुए कहा कि।

वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रिय:।
आत्मानमात्मना सत्यो जित:स्वर्गो न संशय:।।8।।

महाराज नल ने कहा कि हे विप्रवर! अच्छे कुल की स्त्रियों में अपने धर्म के प्रति दृढ़ता होती है।
विषम से विषम परिस्थितियों में भी वे अपने धर्म की रक्षा करने में सतर्क रहतीं हैं। अपने आप की रक्षा करके सत्य और स्वर्ग दोनों को जीत लेतीं हैं। जो अच्छे कुल की स्त्रियां होतीं हैं,वे अपनी इन्द्रियों को तथा मन को नियन्त्रण में रखतीं हैं।

वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रिय:।
विषम और विकट परिस्थितियों में भी अपने आप की रक्षा करनेवालीं स्त्रियां ही सत्य की रक्षिका होतीं हैं।

संसार में ऐसा कोई भी नहीं है कि कभी न कभी जीवन में विषम परिस्थिति नहीं आती हो। सुख साधन सम्पन्न अवस्था में अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करना तो अतिसुकर और सहज ही है। धैर्य की परीक्षा तो विपरीत परिस्थितियों में ही होती है।

यदि कोई स्त्री, पर्याप्त धन और पर्याप्त सामाजिक सम्मान में रहते हुए अपने धर्म का पालन करतीं हैं तो वह तो हो ही जाता है।
किन्तु पारिवारिक, सामाजिक प्रतिकूलता आने पर भी स्त्री यदि अपने धर्म की रक्षा कर लेती है, अपने सत्य की रक्षा कर लेती है, तो ही वह अच्छे कुल की स्त्री है।

शिर छिपाने के लिए निवास न हो,शरीर ढंकने के लिए वस्त्र न हों, और रक्षा करने के लिए कोई पुरुष भी साथ में न हो तो भी वह रोटी,कपड़ा और मकान के लिए,अथवा प्राणों की रक्षा के लिए अपने धर्म का त्याग नहीं करती है। प्राण त्याग कर सकती है, किन्तु अपने धर्म का त्याग नहीं कर सकती है।यही तो श्रेष्ठ कुल की,ऊंचे कुल की विशेषता है।

इसलिए आज भी ऐसीं अनेक क्षत्रियाणियों की जयंती मनाई जा रही है। क्यों कि उन्होंने अपने धर्म की रक्षा के लिए प्राण ही त्याग दिए, किन्तु दुष्टों नीचों को आत्मसमर्पण नहीं किया।

अब 9 वें श्लोक में उच्चकुल की स्त्रियों की विशेषता देखिए।
रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन।
प्राणांश्चारित्रिकवचान् धारयन्ति वरस्त्रिय:।।

महाराज नल ने कहा कि हे भूदेव! वरस्त्री अर्थात जो श्रेष्ठ,कुलीना स्त्रियां होतीं हैं,ऐसी स्त्रियों को यदि उनका भर्ता, पति त्याग भी दे,तो भी वे अपने पति और परिवार के प्रति क्रोध नहीं करतीं हैं। समाज को पता ही नहीं चलने देतीं हैं कि उसके परिवार में ऐसा क्या हो गया है कि उसको पति परिवार ने त्याग दिया है।

श्रेष्ठ कुल की स्त्रियों का ये वीरतापूर्ण स्वभाव होता है कि वे अपने कुल की निंदा करके तथा परिवार की निन्दा करके अपने कुल परिवार पति का अपयश नहीं फैलातीं हैं।

प्राणांश्चारित्रिकवचान् धारयन्ति वरस्त्रिय:।
अपने निर्मलचरित्र के वचनों का पालन करतीं हुईं प्राणों को धारण करतीं हैं। आत्महत्या नहीं करतीं हैं।

इस संसार में स्त्री पुरुषों की उत्पत्ति निरन्तर होती रहती है। किन्तु ऐसीं स्त्रियां और ऐसे पुरुष बहुत कम ही होते हैं,जो अपने धर्म का पालन करने के लिए प्राणों तक का त्याग कर देते हैं। अपने सन्मार्ग का भी त्याग नहीं करते हैं।

ऐसीं स्त्रियां और ऐसे पुरुष तो करोड़ों की संख्या में हैं,जिनने कभी शारीरिक सुख के लिए,कभी पेट भरने के लिए,तथा कभी अपनी स्वतंत्रता स्वच्छंदता के लिए अपने चरित्र को भी त्याग दिया है, और अपनी कुल और जाति परम्परा को भी त्याग दिया है। जिन्होंने वीरतापूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है,ऐसी स्त्रियों का ही अनेक वर्षों तक यश रहता है।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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