Home आध्यात्मिक आध्यात्मिक: जो सुख यहां है,वही सुख सर्वत्र है

आध्यात्मिक: जो सुख यहां है,वही सुख सर्वत्र है

डेस्क न्यूज। श्रीमद् भागवत के 7 वें स्कन्ध के छठवें अध्याय के तीसरे श्लोक में भक्त प्रह्लाद जी ने दैत्यबालकों को संसार का स्वरूप समझाते हुए कहा कि।

सुखमैन्द्रियकं दैत्या देहयोगेन देहिनाम्।
सर्वत्र लभ्यते दैवात् यथा दु:खमयत्नत:।।

भक्तराज प्रह्लाद जी ने गुरुकुल में सभी दैत्यबालकों को समझाते हुए कहा कि हे दैत्यबालको! इस संसार के जितने भी प्रकार के सुख मिलते हैं,वे सभी सुख,शरीर के संयोग से मिलते हैं। किसी भी योनि का शरीर हो,सभी शरीरों में इन्द्रियों का सुख एक जैसा ही होता है। किसी भी लोक का शरीर प्राप्त हो जाए, किन्तु इन्द्रियों से प्राप्त होनेवाले सुख तो एक जैसे ही मिलते हैं।
इन्द्रियों के ये सुख तो मिल ही जाते हैं। जैसे न चाहते हुए भी सर्वत्र दुख मिल जाता है,इसी प्रकार बिना प्रयास के ही सभी योनियों के शरीरों को प्राप्त करने के बाद इन्द्रियों का सुख भी सहज ही प्राप्त हो जाता है।

सुखमैन्द्रियकं दैत्या:-
हे दैत्यबालको! संसार के विषयों के विषय में विचार करने से ही विवेक जागृत होता है। अच्छा! तुम ही विचार करो! संसार में जो भी सुख दिखाई दे रहा है,वह सुख तो पांच ही प्रकार का होता है।

(1) जिह्वा से खट्टा मीठा,तीखा, नमकीन,कड़वा,कषाय जो स्वाद मिलता है,वह स्वाद सभी जीवों को एक समान ही मिलता है, और मृत्युलोक से लेकर सभी स्वर्गादि लोकों में भी यही स्वाद मिलते हैं।

यदि नीबू का खट्टा स्वाद मनुष्य जाति खट्टा ही लगता है,तो किसी भी पशु पक्षी को भी नीबू में खट्टा स्वाद ही मिलता है। देवताओं को भी नीबू का खट्टा स्वाद ही मिलता है।

पृथिवी की कोई भी स्त्री पुरुष,पशु पक्षी आदि कोई भी हो, सभी को नीबू का स्वाद खट्टा ही लगता है।
इसका तात्पर्य यह हुआ कि सभी जीवों की जिह्वा में स्वाद ग्रहण करने की शक्ति एक जैसी ही होती है। तो फिर इसमें नया भी क्या है? कुछ भी नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि शरीर किसी भी योनि का हो,जिह्वा का निर्माण एक ही पदार्थ जल तत्त्व से किया गया है। जिह्वा का सुख भी सर्वत्र एक समान है, और जिह्वा का दुख भी सर्वत्र एक समान ही है।

(2) अब नेत्रों के विषय में भी यही है। यदि किसी स्त्री पुरुष को हाथी को देखने से हाथी ही दिखाई दे रहा है तो कुत्ता,बिल्ली,भैंस,पक्षी आदि सभी को हाथी,हाथी ही दिखाई देता है। पृथिवी के जीवों को जो वस्तु जैसी दिखाई देती है,वही वस्तु सभी लोकों के जीवों को वैसी ही दिखाई देती है।
इसका तात्पर्य यह है कि नेत्रों से भी प्राप्त होनेवाला सुख सभी को एक समान ही होता है। सभी के नेत्रों का निर्माण तेज तत्त्व से किया गया है।

(3) नासिका से सुगन्ध दुर्गंध का ग्रहण होता है। यदि कोई दुर्गंधवाली है तो पृथिवी के सभी स्त्री पुरुषों को वह दुर्गंधयुक्त ही ग्रहण होती है। वानर,पशु पक्षी कोई भी उसको सूंघेगा तो दुर्गन्ध ही आएगी। इसी प्रकार सुगन्धित वस्तु सभी को नासिका से सुगन्धित ही लगेगी।
इसका तात्पर्य यह है कि नासिका का सुगन्ध दुर्गंध ग्रहण करने का गुण भी तथा सुख दुख भी एक समान ही होता है। सभी की नासिका का निर्माण पृथिवी तत्त्व से ही किया गया है।

(4) त्वचा अर्थात शरीर में व्याप्त चमड़ी से शीत उष्ण का ज्ञान होता है। कहीं का भी कोई भी स्त्री पुरुष हो,सभी को शीतवस्तु के स्पर्श से शीतलता का ही अनुभव होता है और उष्ण वस्तु के स्पर्श से उष्णता का ही अनुभव होता है। अग्नि तो सभी को उष्ण ही लगता है। इसका तात्पर्य यह है सभी की त्वचा में एक जैसी ही गुण ग्रहण करने की शक्ति होती है। सभी को शीत उष्ण से होनेवाला सुख भी एक समान ही होता है। सभी की त्वचा वायु तत्त्व से ही निर्मित है।

(5) कानों से सभी को शब्दों का श्रवण होता है।
भयकारक शब्द से सभी जीवों को भय लगता है, और मनप्रसन्न करनेवाले शब्द से सभी जीवों का मन प्रसन्न होता है। इसका तात्पर्य यह कि शब्दों से होनेवाले सुख दुख भी सभी को एक समान ही होते हैं। *आकाश तत्त्व से ही सभी शब्दों का निर्माण किया गया है।

देहयोगेन देहिनाम् –
जहां जिस लोक में भी देह रचना है,वह तो एक जैसी ही होती है। पांच तत्त्वों से ही सभी लोकों के सभी जीवों के शरीर बने हुए हैं।सभी जीवों की इन्द्रियां भी एक जैसीं ही हैं। इन्द्रियों से सभी स्त्री पुरुषों को सुख दुख भी एक समान ही होता है तो, एक लोक से दूसरे लोक के सुख दुख में भी कोई भी अन्तर नहीं है।शरीरों में कोई भी अन्तर नहीं है।

देव, दैत्य, मनुष्य पशु पक्षी आदि कहीं भी कोई भी देहधारी जीव होंगे तो उनके स्त्री पुरुषों के संयोग का सुख भी एक समान ही होता है। जहां भी जो कोई भी होगा,एक जैसा ही सुख उस योनि में सहज ही बिना परिश्रम ही अनायास ही मिलता है।

जितनी बार भी इन्द्रियों का सुख मिलता है,वो भी एक जैसा ही होगा तो उस सुख के लिए इतना अधिक परिश्रम करने से आयु का समय व्यर्थ ही जाता है।

वह सुख भी एक न एक दिन अपने आप ही क्षीण होता चला जाता है। जब एक ही सुख के लिए अनेक व्यक्ति लेना चाहते हैं तो युद्ध भी होता है।

इसलिए संसार के सुखों की प्राप्ति के लिए परिश्रम करना व्यर्थ ही है। सुख के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान का परिवर्तन करना भी व्यर्थ ही है। *सुख के लिए एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का परिवर्तन करना भी व्यर्थ ही है।सर्वत्र एक समान ही सुख मिलता है।

यथा दु:खमयत्नत:।
जैसे बिना प्रयत्न के दुख मिलता है इसी प्रकार सुख भी सर्वत्र बिना प्रयत्न के मिलता है

जिस योनि में जो शरीर प्राप्त होता है,उसको दुख भी बिना प्रयत्न के ही मिलता है। दुख प्राप्ति के लिए कोई भी स्त्री पुरुष किसी भी प्रकार का प्रयत्न नहीं करते हैं, फिर भी दुख मिलता है। इसी प्रकार प्रत्येक देहधारी जीव को समय आने पर बिना प्रयत्न के ही दुख मिलता है तो बिना प्रयत्न के सुख भी अवश्य ही मिलेगा।

इसलिए संसार के सुखों को एक-समान ही समझना चाहिए। दुखों से भी भागकर कहां जाएंगे? जो दुख इस स्थान में मिलता है,वही दुख तो सभी स्थानों में भी मिलेगा।
सुख दुख में समानभाव रखते हुए यह विचार करना चाहिए कि ऐसा कौन सा सुख है जो बिना प्रयत्न के नहीं मिलता है?

आत्मज्ञान और भगवान की भक्ति का आनन्द बिना प्रयत्न के नहीं मिलता है। इसलिए आत्मज्ञान के आनन्द प्राप्ति के लिए तथा भगवान श्रीहरि नारायण की भक्ति प्राप्त करने के लिए ही अधिक से अधिक प्रयत्न करना चाहिए।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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