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आध्यात्मिक: परिवार में एकमात्र पत्नी ही सच्ची मित्र होती है

डेस्क न्यूज। महाभारत के वनपर्व के 313 वें अध्याय के 63 वें और 64 वें श्लोक में यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हुए महाराज धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा कि।

63 वें श्लोक में यक्ष ने मानव जीवन के महत्त्वपूर्ण चार प्रश्न किए हैं।
किंस्वित् प्रवसतो मित्रं किंस्विन्मित्रो गृहे सत:।
आतुरस्य च किं मित्रं किस्विन्मित्रं मरिष्यत:।।63।।

यक्ष ने महाराज युधिष्ठिर से मनुष्य के जीवन के महत्त्वपूर्ण चार प्रश्न किए।

(1)किंस्वित् प्रवसतो मित्रम्?
प्रवास अर्थात यात्रा में सच्चा मित्र कौन होता है?

(2)किंस्विन्मित्रं गृहे सत:?
घर में निवास करनेवाले पुरुष का, परिवार के सभी सदस्यों में से सच्चा मित्र कौन होता है?

(3)आतुरस्य च किं मित्रम्?
रोगी का सच्चा मित्र कौन होता है?

(4)किंस्विन्मित्रं मरिष्यत:?
कुछ ही समय पश्चात मरनेवाले व्यक्ति का सच्चा मित्र कौन होता है?

अब 64 वें श्लोक में इन चारों प्रश्नों का क्रम से उत्तर देखिए।
सार्थ: प्रवसतो मित्रं भार्यामित्रं गृहे सत:।
आतुरस्य भिषङ्मित्रं दानं मित्रं मरिष्यत:।।

धर्मराज युधिष्ठिर ने यक्ष के चारों प्रश्नों का क्रम से उत्तर देते हुए कहा कि।

(1)सार्थ:प्रवसतो मित्रम्।
प्रवास अर्थात यात्रा में जो भी अपने साथ में स्त्री पुरुष होंगे,वे ही यात्रा में सच्चे मित्र होते हैं। जो भी साथ में होते हैं,वे ही यात्रा में प्राप्त होनेवाले कष्टों को दूर करने में सहयोग करते हैं।

यदि प्रारम्भ से ही कोई साथ में कोई मित्र या परिवार का व्यक्ति साथ में न हो तो,उस यात्रा में मार्ग में जो सज्जन पुरुष मिल जाते हैं,वे अपरिचित होने पर भी वही सहयोगी मित्र बन जाते हैं। क्यों कि अपने परिचितों से दूर हो जाने पर तो तत्काल में वही व्यक्ति सहयोग कर सकते हैं,जो मार्ग में आपके साथ चलते हैं। इसलिए अपने घर को छोड़कर यात्रा में सभी से मित्रवत व्यवहार करना चाहिए। यात्रा में कभी भी किसी से कठोर व्यवहार नहीं करना चाहिए।

(2)भार्यामित्रं गृहे सत:।
यदि कोई व्यक्ति अपने घर में रहते हुए ही आजीविका का साधन करता है। घर में ही रहता है तो जब कभी, किसी भी प्रकार की शारीरिक व्याधियां या मानसिक चिंताएं होतीं हैं तो, घर में तो पत्नी ही रात-दिन सहयोग करनेवाली एकमात्र सच्ची मित्र होती है।

किसी पुरुष के आपत्ति में फंसने पर,या रोगी होने पर,पत्नी को जितना दुख और जितनी चिंता होती है,उतना दुख और उतनी चिंता घर के किसी भी भाई,पिता,चाचा,भतीजा आदि को हो ही नहीं सकती है।

यदि कोई पुरुष महीनों वर्षों के लिए निरन्तर रोगी हो जाए तो उसके भाई भाभी,बन्धु, कोई भी रिश्तेदार एक वर्ष तक, न तो उस व्यक्ति के पास रहते हैं, और न ही निरन्तर मल मूत्र आदि की सेवा कर सकते हैं।

यदि घर छोड़कर जाना पड़ा तो उस व्यक्ति के साथ एकमात्र पत्नी ही साथ में जाती है। न तो भाई बन्धु उसके साथ जाएंगे, और न ही उसके मित्र रिश्तेदार ही साथ में जाएंगे।

यदि कभी ऐसी परिस्थिति आ जाए कि रुपयों की आवश्यकता पड़ जाए तो घरवाले या रिश्तेदार तथा मित्र आदि सभी लोग एकाधबार ही थोड़ी कुछ सहयोग करेंगे। वो भी थोड़ा सा सहयोग।

किन्तु अधिक धन की आवश्यकता होगी तो,या तो देंगे ही नहीं, और यदि देंगे तो उसका घर,खेत अथवा सोना चांदी कुछ न कुछ अवश्य ही ले लेंगे।
यदि बार बार मांगेंगे तो साफ साफ ही मना कर देंगे और कहेंगे कि कबतक करेंगे? एक न एक दिन तो वह होना ही है जो होना निश्चित है। अर्थात तुमको तो मरना ही है।

इसीलिए महाराज युधिष्ठिर ने यक्ष से कहा कि इस जीवन में एकमात्र पत्नी ही सच्ची मित्र होती है। पत्नी की लज्जा रक्षा के लिए,सभी का त्याग कर देना चाहिए, किन्तु भाई,बन्धु तथा रिश्तेदारों के लिए पत्नी का त्याग नहीं करना चाहिए। क्यों कि जिनके लिए पत्नी का त्याग कर रहे हैं,वे भी कुछ दिनों के पश्चात त्याग देते हैं।

अब तीसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि –
आतुरस्य भिषङ्मित्रम्।

रोगी मनुष्य की तो एकमात्र औषधि ही मित्र होती है। क्यों कि रोग का नाश तो औषधि से होता है, परिवार से या धन से रोग का नाश नहीं होता है।

अब चौथे प्रश्न का उत्तर देखिए।
दानं मित्रं मरिष्यत:।

कुछ दिनों में या कुछ ही समय में ही मरनेवाले स्त्री पुरुषों के लिए अंतकाल के समय दान ही सच्चा मित्र होता है।

यदि किसी स्त्री पुरुष की मृत्यु होनेवाली हो तो, उसके साथ में तो शरीर भी नहीं जाता है ,तो अन्य व्यक्तियों की और धन आदि की बात ही क्या है? इसलिए मरनेवाले के पति को,पत्नी को तथा पुत्रों, पुत्रियों को उसके लिए गौदान,स्वर्णदान,भूमि भवन दान, अन्नदान आदि यथाशक्ति अवश्य ही करना चाहिए। क्यों कि जो जीवित हैं,वे तो जबतक जीवित रहेंगे तो कमाते खाते ही रहेंगे।

सत्कर्म और पुण्य करने का उनके पास समय होता है। किन्तु मरनेवाले व्यक्ति की शक्ति तो समाप्त ही हो चुकी। उसने पुत्र, पुत्री, पौत्र, परिवार, रिश्तेदारों के लिए यथाशक्ति कुछ न कुछ अवश्य ही किया होगा। व्यक्ति के मरने के पश्चात तो उसका दान पुण्य ही काम आएगा।

इसलिए प्रत्येक स्त्री पुरुष को अपने इस जीवन में इन चारों कार्यों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। तभी वह इस जीवन में कुछ सुख, शांति, समृद्धि, यश आदि प्राप्त कर सकते हैं।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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