Home मध्यप्रदेश आध्यात्मिक: ब्राह्मणों के विनाश से सबका विनाश निश्चित है?

आध्यात्मिक: ब्राह्मणों के विनाश से सबका विनाश निश्चित है?

डेस्क न्यूज। महाभारत के वनपर्व के 103 वें अध्याय के चौथे श्लोक में इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान नारायण से प्रार्थना करते हुए कहा कि।

क्षीणेषु च ब्राह्मणेषु पृथिवी क्षयमेष्यति।
तत:पृथिव्यां क्षीणायां त्रिदिवं क्षयमेष्यति ।।

समुद्र में छिपे हुए कालेय नामके वृत्रासुर के दैत्य, प्रतिदिन ही रात्रि में आकर ब्राह्मणों को तथा ब्राह्मण ब्रह्मचारियों को मारकर पुनः जाकर समुद्र में छिप जाते हैं।

ब्राह्मणों का प्रतिदिन संहार देखकर इन्द्र आदि सभी देवताओं ने भगवान नारायण के समीप पहुंच कर विविध प्रकार से स्तुति करने के पश्चात् निवेदन करते हुए बोले कि –

क्षीणेषु च ब्राह्मणेषु पृथिवी क्षयमेष्यति।
हे भगवन्! ब्राह्मणों के नष्ट होने पर सम्पूर्ण पृथ्वी का विनाश हो जाएगा।
देवताओं को यज्ञभुक् कहते हैं। मृत्युलोक में जब ब्राह्मण यज्ञ करते हैं,तभी देवताओं को भोजन प्राप्त होता है।

वेद मंत्रों से ही यज्ञ होते हैं। वेदों को धारण करने वाले ब्राह्मण ही हैं। सभी देवता वेद मंत्रों के अधीन होते हैं, और वेद मंत्र, ब्राह्मणों के अधीन होते हैं।

अर्थात ब्राह्मणों के हृदय में विराजमान वेद मंत्रों से जब यज्ञ किया जाता है,तभी देवताओं को भोजन प्राप्त होता है। देवता प्रसन्न होकर समय समय पर वृष्टि करते हैं। जब वर्षा होती है,तभी अन्न,घास, वनस्पति आदि उत्पन्न होते हैं। जब अन्न घास वनस्पति आदि उत्पन्न होते हैं,तभी सभी जीवों का जीवन भी सुचारु रूप से संचालित होता है।

देवताओं के अधीन ही जलवर्षा है। जल वर्षा के अधीन ही सम्पूर्ण जीवों का जीवन है। यदि यज्ञवेत्ता , वेदवेत्ता,यज्ञकर्ता ब्राह्मण ही नहीं रहेंगे तो देवताओं को प्रसन्न करने वाले भी कोई नहीं हैं।

इतना ही नहीं
तत: पृथिव्यां क्षीणायां त्रिदिवं क्षयमेष्यति।

देवताओं ने भगवान नारायण से प्रार्थना करते हुए कहा कि हे प्रभो! यदि सभी ब्राह्मणों का इसी प्रकार संहार होता रहेगा, तो इस मृत्युलोक में कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है,जो वेदों को यथार्थ रूप से धारण कर सके। जब यज्ञकर्ता ब्राह्मण ही समाप्त हो जाएंगे तो यज्ञ भी नहीं होंगे। यज्ञ नहीं होंगे तो हम सभी देवता भोजन के अभाव में क्षीण हो जाएंगे। हमारे क्षीण होने पर वर्षा भी नहीं होगी। वर्षा नहीं हुई तो सम्पूर्ण पृथिवी ही समाप्त हो जाएगी, पृथिवी समाप्त होने पर हमारा त्रिदिव अर्थात स्वर्ग भी नहीं रहेगा। जब हम ही नहीं रहेंगे तो स्वर्ग भी कैसे रहेगा?

देवताओं ने कहा कि हे भगवान! सम्पूर्ण संसार की सत्ता हम देवताओं से है। किन्तु हम देवताओं की सत्ता तो वेदविद्या सम्पन्न विद्वान ब्राह्मणों से ही है। इसीलिए इस संसार की सत्ता एकमात्र ब्राह्मणों से ही है। बड़े बड़े राजाओं ने विद्वान ब्राह्मणों की सदा ही सभी प्रकार से सेवा की है। ब्राह्मणों के कारण ही राजाओं का सुयश फैला है।

पाणिनिव्याकरण के मूर्धन्य विद्वान नागेशभट्ट आदि विद्वान जब भी कोई ग्रंथ लिखते हैं तो सबसे पहले जिस राजा से आजीविका प्राप्त होती थी,उनका नाम लिखते हैं।

राजा वीर विक्रमादित्य जी तो मूर्धन्य नौ विद्वानों को अपनी सभा में अग्रगण्य रखकर यशस्वी हुए। रामचरितमानस मानस में तो आदि से अन्त तक भगवान श्री राम जी ब्राह्मणों के समक्ष रहने पर सबसे पहले प्रणाम करते हैं। यदि कोई ब्राह्मण समीप में नहीं होते थे तो मानसिक रूप से प्रणाम करके ही कुछ कार्य करते थे। भगवान स्वयं ही ब्राह्मणों को इतना अधिक मानते हैं कि भगवान का नाम ही ब्रह्मण्यदेव पड़ गया है।

नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।
रामचरितमानस से लेकर अठारहों पुराणों में, स्मृतियों में सर्वत्र ही वेदवेत्ता ब्राह्मणों से लेकर ज्ञानहीन ब्राह्मणों तक का महत्त्व वर्णित है।

इस मृत्युलोक की सत्ता तथा देवताओं की सत्ता और स्वर्ग तक की सत्ता, ब्राह्मणों की रक्षा से ही रहेगी। आज वर्तमान में भी जो भी कुछ धार्मिकता दिखाई दे रही है, भगवान के विषय में भी जो भी कुछ सुनाई दे रहा है,वो सब मनस्वी,तपस्वी, मनीषी ब्राह्मणों के कारण ही है।

इसीलिए समाज को तथा शाशन को सदा ही ब्राह्मणों की सेवा, सुरक्षा तथा आजीविका व्यवस्था करते हुए उनका सम्मान करना चाहिए। अन्यथा ब्राह्मणों के विनाश से सम्पूर्ण समाज विकृतविचारधारा का हो जाएगा। आपस में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, मद और लोभ के वशीभूत होकर, परस्पर वैमनस्य के कारण युद्ध करके विनष्ट हो जाएंगे।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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