Home आध्यात्मिक आध्यात्मिक: भगवान की वनमाला, वस्त्र और यज्ञोपवीत क्या हैं?

आध्यात्मिक: भगवान की वनमाला, वस्त्र और यज्ञोपवीत क्या हैं?

डेस्क न्यूज। श्रीमद् भागवत के 12 वें स्कन्ध के 11 वें अध्याय के 11 वें श्लोक में सूत जी ने भगवान नारायण के आभूषणों का तथा उनके यथार्थ स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि

स्वमायां वनमालाख्यां नानागुणमयीं दधत्।
वासस्छन्दोमयं पीतं ब्रह्मसूत्रं त्रिवृत् स्वरम्।।

सूत जी ने नैमिषारण्य में विराजमान शौनकादि ऋषियों से, भगवान नारायण के सगुण रूप का वर्णन करते हुए कहा कि -हे शौनकादि ऋषियो! भगवान नारायण के सगुण रूप में जो भी शङ्ख चक्र,आदि आयुध हैं,वे सभी भगवान के ही समान दिव्य हैं। संसार का कोई भी द्रव्य भगवान के दिव्य देह में नहीं होता है।

स्वमायां वनमालाख्यां नानागुणमयीं दधत्-
भगवान के श्रीअंग में दिखाई देनेवाली विविध प्रकार के पुष्पों की माला संसार के कुम्हलानेवाले, नष्ट होनेवाले पुष्पों की माला नहीं है। वह वनमाला तो उनकी ही महामाया है। जिस माया ने संसार के सभी जीवों को मोहित कर रखा है,ये वही भगवती महामाया ही भगवान नारायण के वक्षस्थल में वनमाला के रूप में विराजमान है।

नानागुणमयीं दधत्।
जैसे माला में अनेक वर्ण के पुष्प होते हैं,उसी प्रकार नाना अर्थात अनेक प्रकार के गुणोंवाली भगवती माया ही अनेक वर्णों के पुष्पों के रूप में विराजमान है। विशेषरूप से वनमाला में तीन प्रकार के ही पुष्प दिखाई देते हैं। क्यों कि माया के तीन प्रकार के ही स्वरूप हैं।

(1) सत्वगुण-
सत्वगुण का श्वेत वर्ण होता है। वनमाला में श्वेतवर्ण के पुष्प हैं।

(2) रजोगुण-
रजोगुण का रक्तवर्ण होता है। वनमाला में रक्त अर्थात लालवर्ण के पुष्प हैं।

(3) तमोगुण-
तमस् अर्थात अन्धकार।

तमोगुण कृष्ण अर्थात काले वर्ण का होता है। तमालवृक्ष के समान कुछ कृष्णवर्ण के पुष्प हैं। अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि में तीन माया के तीन गुणों से प्रभावित जीव ही होते हैं। तीन प्रकार के ही जीव होते हैं।

सत्वगुण सम्पन्न जीवों का स्वभाव शान्त होता है। तमोगुण सम्पन्न जीवों का स्वभाव आलस्यपूर्ण,हिंसक, अहंकारी होता है। तमोगुण सम्पन्न जीवों का स्वभाव, भोगवृत्ति,काम, क्रोध,लोभ मोह आदि से पूर्ण होता है।

पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि से लेकर मनुष्य पर्यंत सभी जीवों में यह माया व्याप्त रहती है। माया के इन तीनों गुणों से प्रभावित मनुष्य भी तीन प्रकार का ही होता है।

वेदज्ञान सम्पन्न ब्राह्मणों में और दम्भरहित साधुओं में सत्वगुण की अधिकता होती है। मानापमान सहन करना, स्त्री,धन,यश,आदि से दूर रहते हुए एकमात्र भगवान में और सत्कर्मों में प्रवृत्ति रहती है।

सत्कर्म और पुण्यकर्म करनेवाले क्षत्रियों में सत्वगुण के साथ साथ सिंह के समान बीरता, शौर्य, आदि मिश्रित गुण होते हैं। अर्थात क्षत्रिय में रजोगुण मिश्रित सत्वगुण होता है। रजोगुण की अधिकता हो जाती है तो युद्ध आदि में भी प्रवृत्ति होती है। सत्वगुण की प्रधानता होने पर,शान्तवृत्ति, यज्ञ, पूजा, दया, आदि दिखाई देते हैं। क्षत्रिय की ब्राह्मण के प्रति श्रद्धा, भक्ति, विश्वास होने के कारण सत्कर्मों में प्रवृत्ति रहती है।

वैश्यों में प्रायः रजोगुण की मात्रा अधिक होती है। इसलिए वैश्य यदि कोई धार्मिक कार्यों को भी करता है तो उस धार्मिक कार्यों के बदले में धन,वैभव,लक्ष्मी,आदि की याचना भी करता है। भगवान से भी व्यापार करता है।

शूद्र जाति में तमोगुण और रजोगुण की अधिकता होती है। इसलिए शूद्रों में भक्ति,उपासना तथा सहनशीलता आदि गुणों की मात्रा भी बहुत कम होती है। सत्वगुण सम्पन्न वैश्य और शूद्र बहुत ही कम पाए जाते हैं। सत्वगुण की न्यूनता होने के कारण क्रोध, अनम्रता, अकड़पन, आदि दुर्गुणों की अधिकता होती है।

इतना ही नहीं, शूद्रों को कोई भी कुछ भी यदि बता देता है, तो विना विवेक किए ही मान लेते हैं। मानने करने के बाद दुख भी बहुत भोगते हैं।

इस प्रकार इस संसार को चलानेवाली तीन गुणों वाली माया ही भगवान नारायण की श्रीकंठ में वनमाला के रूप में विराजमान है।

वासस्छन्दोमयं पीतम्।
भगवान के श्रीअंग में जो पीताम्बर विराजमान है,वह साक्षात् छन्द अर्थात वेद हैं। वेद ही पीताम्बर बनकर भगवान नारायण को आच्छादित किए हुए हैं।

ब्रह्मसूत्रं त्रिवृत् स्वरम्।
ब्रह्मसूत्र अर्थात यज्ञोपवीत

भगवान के श्रीअंग में जो यज्ञोपवीत है, वह त्रिवृत् स्वर अर्थात तीन स्वरों से सम्पन्न ओंकार है। अ उ और म् ये त्रिवृत स्वर कहा जाता है। यजुर्वेद, सामवेद और ऋग्वेद इन तीनों वेदों को त्रयी कहा जाता है।तीनों वेदों में ओंकार ही प्रधान है। इसी को प्रणव कहते हैं। इसमें ही उदात्त, अनुदात्त और स्वरित ये तीनों स्वर समाहित हैं। इसीलिए इसको त्रिवृत् स्वर कहते हैं।

अर्थात भगवान नारायण का देह, वस्त्राभूषण और उनके शंख, चक्र, गदा, पद्म, आयुध तथा कौस्तुभमणि आदि सभी भगवान के ही स्वरूप हैं। सगुण साकार भगवान का स्वरूप भी संसार के जीवों के शरीरों से भिन्न और दिव्य होता है। भगवान के जन्म और कर्म सभी दिव्य अर्थात विलक्षण अलौकिक होते हैं। इसीलिए भगवान के किसी भी प्रकार के जन्म कर्म में संदेह करना भी एक अज्ञान ही है।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

जनता और माशूम बच्चों को जहर बेचने वाले भाजपा से वार्ड नंबर 8 से पार्षद का चुनाव लड़ने वाले लालू लालवानी को जनता सिखाएगी...

छतरपुर। जनता और माशूम बच्चों को जहर बेचने वाले भाजपा से वार्ड नंबर 8 से पार्षद का चुनाव...

27 जून को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह करेंगे रोड शो

छतरपुर। प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 27 जून को शहर छतरपुर में रोड शो कर नगरीय निकाय...

प्रेक्षक ने मतदान प्रक्रिया का किया निरीक्षण

छतरपुर जसं। नगरीय निकायों एवं त्रि-स्तरीय पंचायत आम निर्वाचन 2022 की प्रक्रिया के पुनरीक्षण के लिए नियुक्त प्रेक्षक...

11 अपराधियों को किया जिला बदर

छतरपुर जसं। जिला दण्डाधिकारी छतरपुर संदीप जी आर ने पुलिस अधीक्षक से प्राप्त प्रस्ताव अनुसार म.प्र. राज्य सुरक्षा...

Recent Comments

%d bloggers like this: