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आध्यात्मिक: माता का गौरव पृथिवी से भी अधिक है

डेस्क न्यूज। महाभारत के वनपर्व के 313 वें अध्याय के 59 वें और 60 वें श्लोक में यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देते हुए महाराज धर्मराज युधिष्ठिर ने माता को पृथ्वी से भी अधिक गौरवशाली बताते हुए कहा कि

यक्ष ने पूछा कि –
किंस्विद् गुरुतरं भूमे:किंस्विदुच्चतरं च खात्।
किंस्विच्छ्रीघ्रतरं वायो:किंस्विद् बहुतरं तृणात्।।59।।

यक्ष ने पूछा कि –
(1)किंस्विद् गुरुतरं भूमे:?
पृथिवी से भी अधिक गौरवशाली और भारी क्या है?
(2) किंस्विदुच्चतरं च खात्?
ख अर्थात आकाश से भी अधिक ऊंचा अर्थात श्रेष्ठ क्या है?
(3) कि़स्विछ्रीघ्रतरं वायो:?
वायु से भी अधिक शीघ्रगामी कौन है?
(4) किंस्विद् बहुतरं तृणात्?
तिनकों से भी अधिक संख्या किसकी है?

अब 60 वें श्लोक में धर्मराज युधिष्ठिर के उत्तर देखिए?
माता गुरुतरा भूमे:खात् पितोच्चतरस्तथा।
मन:शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात्।।60।।

प्रथम प्रश्न है कि पृथिवी से भी अधिक भारी और श्रेष्ठ क्या है?इसका उत्तर है कि –
माता गुरुतरा भूमे:।

जन्मदात्री माता ही भूमि अर्थात पृथिवी से भी अधिक भारी है और श्रेष्ठ है। उत्पत्ति तो चार प्रकार की ही है। गर्भधारण करनेवाली माता भी चार प्रकार की हैं।

(1)जरायुज-अर्थात साक्षात्
बच्चे को जन्म देनेवाली स्तनधारी, दुग्धपान कराकर पालन-पोषण करनेवाली मां। मनुष्य, वानर,गौ,महिष,हाथी,ऊंट आदि सभी जन्मदात्री माताएं अपने बच्चों का पालन-पोषण अपने शरीर से निकलनेवाले दूध से ही करतीं हैं।

ये सभी माताएं बारम्बार अनेक बार गर्भधारण करके सन्तानोत्पत्ति का अपार कष्ट सहन करतीं हैं। जैसे प्रथम संतान का पालन करतीं हैं, ऐसे ही बिना भेदभाव के प्रत्येक संतान का पालन करतीं हैं।वही स्नेह,वही रक्षा,वही लालसा,वही समर्पण प्रत्येक संतान के लिए रहता है।

इतना ही नहीं,जब बच्चा गर्भ से बाहर निकलता है तो उसे अपार असह्य कष्ट होता है, किन्तु बच्चे के बाहर आते ही वह अपने दुख को भूलकर बच्चे को सहलाने लगती है। शरीर में लगे हुए मल मूत्र आदि को चाट चाट कर बच्चे को स्वच्छ करके अपने स्नेह और दुग्ध से पालपोष कर बड़ा कर देती है।

पशुओं की माताओं को छोड़कर पशु तो बड़े होकर चले ही जाते हैं। किन्तु बुद्धिमान कही जानेवाली मनुष्य जाति भी पशु के समान ही अपनी माता को छोड़कर चले जाते हैं।

जो स्त्री पुरुष, अपने वृद्ध माता पिता को छोड़कर अपने सुख के लिए स्त्री, पुत्र, पुत्री में आसक्त हो जाते हैं,वे साक्षात् पशु के समान ही हैं। माता पिता का भरण-पोषण न करनेवाले स्त्री पुरुष,सूकर,कूकर के समान ही हैं।

पृथिवी में ही सभी जीवों का जीवन है। पृथिवी ही सभी जीवों का आधार है। पृथिवी से ही सभी जीवों को छहों प्रकार के रसों की और औषधि की प्राप्ति होती है। पृथिवी को खोदने पर ही सभी जीवों को जल प्राप्त होता है। पृथिवी में ही सभी प्रकार के रत्न और सुवर्ण, रजत, हीरा, मोती, माणिक्य आदि प्राप्त होते हैं। पृथिवी का महत्त्व तो मनुष्य के सामने प्रत्यक्ष ही है। पृथिवी ही पर्वत,नदी, समुद्र,वृक्ष,तथा सभी जीवों का भारवहन करती है।

इसी प्रकार सम्पूर्ण शरीरधारी जीवों को गर्भ में धारण करनेवाली,पालन पोषण करनेवाली तो स्त्री जाति ही है। साक्षात् गर्भधारण करके शरीर को ही उत्पन्न करनेवाली स्तनधारी स्त्री ही तो मां है।

(2) अंडों को गर्भ में धारण करके अंडों का पालन करनेवाली स्त्री भी मां है। मछली,कछवा आदि जलचर स्थलचर अंडज प्राणियों को धारण करनेवाली स्त्री जाति ही मां है।

(3) स्वेदज
अर्थात पानी, पसीने से उत्पन्न होनेवाले जीवों का पालन पोषण भी इनकी स्त्री जाति का जीव मां ही है। स्वेद अर्थात पसीने से भी जुआं,खटमल आदि बच्चे उत्पन्न होते हैं, उनकी माताएं भी अपने अनेक बच्चों को तबतक साथ में रखतीं हैं,जबतक वे बड़े होकर स्वयं ही आत्मरक्षा में समर्थ नहीं हो जाते हैं।

(4) उद्भिज
अर्थात धरती फोड़कर उत्पन्न होनेवाले वृक्ष,लता, वनस्पति आदि पुष्प,फल,आदि देनेवाली वनस्पति की माता पृथिवी ही है।

इस संसार में जो भी गर्भ को धारण करनेवाली स्त्री जाति है,वे सभी माता ही हैं। इसीलिए युधिष्ठिर जी ने कहा कि इस संसार में पृथिवी से भी अधिक भारी और श्रेष्ठ माता ही होती है।

एक मां अपने बच्चे को गर्भ में धारण करती है। बच्चे का भार सहन करती है, किन्तु बच्चे,अपनी मां का भार नहीं सहन कर पाते हैं, इसीलिए उसे पृथिवी से भी अधिक भारी कहा गया है। पृथिवी में जीवन धारण करने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करनेवाली एकमात्र मां ही है, इसीलिए उसे पृथिवी से भी अधिक गौरवशालिनी कहा गया है।

दूसरे प्रश्न का उत्तर –
(2)खात् पितोच्चतरस्तथा।
ख अर्थात आकाश।

पिता,आकाश से भी अधिक उच्चतर अर्थात ऊंचा है, श्रेष्ठ है।
आप जब ऊपर को देखते हैं तो जहां तक आपकी दृष्टि जा सकती है, वहां तक आकाश ही आकाश दिखाई देता है, और कुछ भी नहीं दिखाई देता है।

इसका तात्पर्य यह है कि किसी पुत्र पुत्री को मां जन्म देती है, तो जबतक उसके स्तनों में दूध आता है,तभी तक मां उसका पालन पोषण करती है। किन्तु जिस दिन से संतान अन्न खाने लगती है,उस दिन से लेकर अन्त तक पिता का ही कार्य रहता है। शिक्षा,वस्त्र,भवन, आजीविका का साधन, सामाजिक प्रतिष्ठा,सभ्यता, संस्कार आदि सबकुछ पिता ही देता है, और कोई नहीं दे सकता है। किसी भी स्त्री पुरुष के जीवन में, पिता का योगदान अंत तक रहता है, इसीलिए तो पिता को आकाश के समान व्यापक कहा जाता है।

तीसरे प्रश्न का उत्तर।
(3) मन:शीघ्रतरं वातात्

वात अर्थात वायु से भी अधिक शीघ्रगामी मन होता है।

चौथे प्रश्न का उत्तर-
(4) चिन्ता बहुतरी तृणात्।

पृथिवी में तृणों की अर्थात तिनकों की जितनी संख्या है, उससे अधिक संख्या चिन्ता की है। तिनकों को तो साफ भी किया जा सकता है, किन्तु कोई भी मनुष्य अपनी चिंताओं की संख्या नहीं बता सकता है कि जबसे ज्ञान हुआ है,तब से अब तक कितनी बार,किस किस की,कब कब चिंता की है।

जब से इस शरीर का तथा वस्तुओं का ज्ञान हुआ है,तब से लेकर मरने तक एक स्त्री पुरुष ने कितनी बार किस किस की चिंता की है,उसकी गिनती करना कठिन है। इसीलिए कहा गया है कि तिनकों की संख्या से चिंताओं की संख्या अधिक होती है। इस प्रकार से यह संसार इतना अद्भुत है कि एक स्त्री पुरुष को अपना कर्तव्य निर्वाह करने के लिए भी ज्ञान चाहिए।

मात्र अपना पेट भरने का ज्ञान,तथा भोगवासना की पूर्ति का ज्ञान तो पशु पक्षी को भी होता है। मनुष्य हो तो, मनुष्य के समान ही करना चाहिए। अन्यथा शरीर तो मनुष्य का होगा और गुण,पशुता जैसे होंगे तो ऐसे स्त्री पुरुषों को मनुष्य नहीं, पशु ही कहा जाता है।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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