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आध्यात्मिक: शिव जी पांच मुखों से पांच प्रकार के कार्य करते हैं

डेस्क न्यूज। शिवपुराण के “विद्येश्वर संहिता”के 10 वें अध्याय के 6 वें और 7 वें श्लोक में भगवान शिव जी ने भगवान नारायण को और ब्रह्मा जी को पांच मुखों से पांच प्रकार के कार्य बताते हुए कहा कि।

दूसरे श्लोक में भगवान शिव जी ने पांच मुखों से पांच प्रकार के कार्य बताते हुए कहा कि सृष्टिस्थितिश्च संहारस्तिरोभावोsप्यनुग्रह:।
पञ्चैव मे जगत्कृत्यं नित्यसिद्धमजाच्युतौ।।2।।
भगवान शिव जी ने कहा कि हे अच्युत!हे अज! सृष्टि के पांच प्रकार के कार्य करने के कारण मैं पंचमुख हूं।

(1)सृष्टि करना।
(2)स्थिति अर्थात जिसकी जितनी आयु है,उतनी आयु तक उसको रखना।
(3)संहार अर्थात मर्दन करना। अर्थात समय समय पर सभी का नाश।
(4)तिरोभाव अर्थात उत्क्रम।
उत्क्रम अर्थात कर्म के अनुसार सभी जीवों को योनियों में उत्क्रमण,भेजना।
(5) अनुग्रह अर्थात साधन सम्पन्न भगवद्भक्त धर्मात्मा का मोक्ष, कल्याण करना।

कृत्यमेवं हि पञ्चकम्
ये पांच कार्य मेरे द्वारा ही संपादित होते हैं। इसलिए मैंने पांच मुखों का स्वरूप धारण किया है।

ये पांचों कार्य कैसे कैसे करते हैं? तो छठवें श्लोक में सुनिए।
तदिदं पञ्चभूतेषु दृश्यते मामकैर्जनै:
सृष्टिर्भूमौ स्थितिस्तोये संहार:पावके तथा।।6।।

भगवान शिव जी ने कहा कि हे नारायण! मेरे भक्तों को ये पांचों कार्य पंचमहाभूतों में ही दिखाई देते हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पांचों महाभूतों से ही पांचों प्रकार के कार्य करते हैं।

(1) सृष्टिर्भूमौ-
भूमि अर्थात पृथिवी में सभी जीवों की सृष्टि होती है। सभी जीवों का भोजन भी पृथिवी में ही प्राप्त होता है। जहां जहां जिस लोक में जो जो सृष्टि होती है, सर्वत्र भूमि में ही स्थित रहते हैं। अनन्त ब्रह्माण्डों में अनन्त जीवों की सृष्टि होती है। सभी ब्रह्माण्डों में पृथिवी ही आधार है। सभी जीव पृथिवी में ही विचरण करते हैं,शयन, भवन,भोजन, उत्पत्ति आदि सबकुछ पृथिवी तत्त्व में ही होता है।

(2)स्थितिस्तोये-
सभी जीवों का जीवन तोय अर्थात जल में स्थित होता है।
जल से ही शरीर की स्थिति रहती है। बिना भोजन के तो प्रत्येक जीव कुछ दिनों तक जीवित रह सकता है, किन्तु बिना जल के तो कोई भी एकदिन भी स्थित, जीवित नहीं रह सकता है। इस सृष्टि की स्थिति तो जल से ही रहती है। जल के द्वारा ही मैं सारी सृष्टि की रक्षा करता हूं।

(3)संहार:पावके तथा
पावक अर्थात अग्नि तत्त्व से सम्पूर्ण संसार का संहार करते हैं। अग्नि सूर्य, चंद्र ये तीनों ही अग्नि तत्त्व है। जब हमको संहार करना होता है तो अग्नि तत्त्व से संहार होता है।

तिरोभावोsनिले तद्वदनुग्रह इहाम्बरे।
सृज्यते धरया सर्वमद्भि:सर्वं प्रवर्धते।।7।।
(4) तिरोभावोsनिले

तिरोभाव अर्थात शरीर की समाप्ति अनिल अर्थात वायु में स्थित है। प्राणवायु जबतक चलता रहेगा ,तभी तक यह शरीर रहेगा। प्राणवायु की समाप्ति पर ही शरीर की समाप्ति होती है। वायु तत्त्व में तिरोभाव क्रिया है।

(5) तद्वदनुग्रह इहाम्बरे-
अम्बर अर्थात आकाश तत्त्व में अनुग्रह अर्थात मोक्ष स्थित हैं।
इस प्रकार से पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पांचों तत्व ही भगवान शिव के पांच मुख हैं। इन्हीं पांचों तत्वों से ही अनन्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव, और अनुग्रह अर्थात मोक्ष होता रहता है।

नम:शिवाय इस पंचाक्षर मंत्र में जो पांच अक्षर हैं,इसके प्रत्येक अक्षर से ये पांचों कार्य करते रहते हैं। अर्थात पृथिवी, जल, तेज, वायु, और आकाश ये पांचों तत्त्व ही शिव जी के पांच मुख हैं। सभी जीवों का जीवन,तिरोभाव मृत्यु, पालन,मोक्ष आदि पांचों कार्य इसी संसार में ही होते हैं। जिनके हृदय में भगवान की भक्ति,साधना होती है,उनको ही इन प्रत्यक्ष पांचों तत्त्वों की दिव्यता का दर्शन होता है। भगवान शिव में ही सभी जीव स्थित हैं।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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