Home आध्यात्मिक आपत्तिकाल में भी स्त्रियों को, ऐसी स्त्रियों से दूर रहना चाहिए

आपत्तिकाल में भी स्त्रियों को, ऐसी स्त्रियों से दूर रहना चाहिए

डेस्क न्यूज। महाभारत के “वनपर्व”के 234 वें अध्याय के 11 वें श्लोक में द्वैतवन में मिलने आई हुई श्रीकृष्ण भगवान की पटरानी सत्यभामा से द्रौपदी ने कहा कि।

महाकुलीनाभिरपापिकाभि:
स्त्रीभि:सखीभिस्तव सख्यमस्तु।
चण्डाश्च शौण्डाश्च महाशनाश्च,
चौराश्च दुष्टाश्चपलाश्च वर्ज्या:।।

अच्छे कुल की स्त्रियों को सदा ही, अच्छे कुल की स्त्रियों से ही मित्रता करना चाहिए। पाप न करनेवाले स्त्रियों का ही संग करना चाहिए।
जो स्त्रियां चण्डा अर्थात बात बात में क्रोध करतीं हैं,शौण्डा अर्थात सदा ही झूठ बोलकर दूसरों को लड़वाने में कुशल होतीं हैं तथा महाशना अर्थात अधिक खातीं हैं।

जब देखो तभी कुछ न कुछ दिनभर खातीं ही रहतीं हैं। चौरा अर्थात चोरी करतीं हैं। दुष्टा अर्थात सदा ही दूसरों के दोषों को देखकर सबकी निंदा चुगली करतीं रहतीं हैं। चापला अर्थात अपने घर में बैठकर सदा ही दूसरों के घरों में ही बैठतीं रहतीं हैं,ऐसी स्त्रियों को चपला कहते हैं।
अर्थात चण्डा,शौण्डा,चोर, महाशना, और चंचला चपला स्त्रियों से सदा ही दूर रहना चाहिए। ऐसी स्त्रियों से मित्रता करनेवाली स्त्रियों के घर में कलह, अशांति, दुख, विपत्ति, सदा ही बनी रहती है। आइए,थोड़ा विचार करते हैं।

महाकुलीनाभिरपापिकाभि:,
स्त्रीभि:सखीभिस्तव सख्यमस्तु।।

द्रौपदी ने कहा कि हे सत्यभामे ! अच्छे कुल की स्त्रियां, अपने कुल की परम्परा की रक्षा करने में संयमित रहतीं हैं। जिनके कुल में श्रेष्ठ पुरुष रहते हैं,वे कुल ही अच्छे कुल कहे जाते हैं।

जिस कुल में कोई भी पुरुष व्यभिचारी,चोर, झूठ बोलनेवाला, मदिरापान करनेवाला, मांसाहारी आदि दुर्गुणों वाला नहीं होता है,तथा सर्वदा ही सबका सहयोग करनेवाले, दयालु स्वभाववाले बीर पुरुष होते हैं,वही कुल अच्छा कुल कहा जाता है। ऐसे कुल की कन्याओं को तथा वहां की स्त्रियों को भी वैसी ही मर्यादा रखना चाहिए। तभी स्त्रियों का सम्मान आदर होता है।

अपने कुल का यश,अपने कुल की प्रतिष्ठा सदैव बनी रहे, इसलिए अच्छे कुल की स्त्रियों को अच्छे कुल की मर्यादित, सभ्य, सुशीला स्त्रियों के साथ ही मित्रता करना चाहिए। अच्छी स्त्रियों की संगति से मनोबल आत्मबल की वृद्धि होती रहती है।अब देखिए कि कैसी स्त्रियों से सदा ही दूर रहना चाहिए।

चण्डाश्च शौण्डाश्च महाशनाश्च,
चौराश्च दुष्टाश्चपलाश्च वर्ज्या:।

समाज में अनेक प्रकार के स्त्री पुरुष तो सर्वत्र होते हैं। यदि पुरुषों में दुष्टहृदय के पुरुष होते हैं तो स्त्रियों में दुष्ट हृदय की स्त्रियां होतीं हैं।

कुछ स्त्रियां तो महाशना होतीं हैं। जिन स्त्रियों की जीभ स्वादिष्ट भोजन में अधिक लालायित रहती है,वो निश्चित ही खाने पीने के लिए किसी के लिए कुछ भी कह सकती है।
ऐसी स्त्रियों से भी कुलीन स्त्रियों को मित्रता नहीं करना चाहिए। जो स्त्री कलह करने वालीं होतीं हैं, छोटी-छोटी बातों में अधिक क्रोध करती हो,वो तो निश्चित ही युद्ध करवा कर मानतीं हैं। ऐसी स्त्रियों को ही चण्डा कहते हैं।

ऐसीं चण्डा स्त्रियां बहुत जलदी ही झूठा आरोप लगाकर अपयश फैला देतीं हैं-
इसी प्रकार शौण्डा अर्थात चालाक चतुर स्त्रियां भी अहंकारिणी होतीं हैं। कभी कभी मीठा मीठा बोलकर एक दूसरे की चुगली करके घर परिवार में वैमनस्य उत्पन्न करवा देतीं हैं। ऐसी स्त्रियों से भी मित्रता नहीं करना चाहिए। कुछ स्त्रियों की ऐसी आदत होती है कि किसी की भी कुछ अच्छी वस्तु देखतीं हैं तो मांगतीं नहीं हैं, अपितु चोरी ही कर लेतीं हैं।

अर्थात अच्छे वंश की बहु बेटियों को अपने घर में सुख शांति समृद्धि बनाए रखने के लिए ऐसी किसी भी दुष्ट स्वभाव की स्त्रियों से सदा ही दूर ही रहना चाहिए।

यदि दुष्ट स्त्रियों से सज्जन सरलहृदया स्त्रियां व्यवहार मित्रता रखेंगीं तो निश्चित ही वे दुष्ट स्वभाव की स्त्रियां उसको अपने दुर्गुण सिखा देंगी । पति परिवार के प्रति द्वेष ईर्ष्या का भाव जागृत करके शान्त घर में कलह की अग्नि लगा देंगीं।

पारिवारिक कर्तव्य धर्म से विमुख करके दूर हो जाएंगी-
इसलिए जैसे पुरुषों को दुष्ट हृदय के पुरुषों से मित्रता नहीं करना चाहिए,उसी प्रकार अच्छे कुल की स्त्रियों को भी दुष्ट स्वभाव की स्त्रियों से मित्रता व्यवहार नहीं रखना चाहिए। तभी घर में परस्पर प्रेम,सुख, शांति, समृद्धि, सदा ही निवास करते हैं।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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