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पूरा विपक्ष संविधान दिवस कार्यक्रम से रहा नदारद, मोदी ने 22 मिनट भाषण दिया, बिना नाम लिए कांग्रेस, अखिलेश और लालू पर तंज कस गए

नई दिल्ली। आज मौका था 71वे संविधान दिवस का जगह थी संसद का सेंट्रल हॉल और बोलने वाले थे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। लेकिन सुनने वालों में सिर्फ भाजपा के लोग या उनके दोस्त। बात हम सदन की कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने नाम तो किसी का नहीं लिया, पर बातें सबकी कर डालीं। इशारा सबकी ओर था, लेकिन फोकस में यूपी के अखिलेश से लेकर दिल्ली का सोनिया परिवार था। कश्मीर के अब्दुल्ला-मुफ्ती फैमिली से लेकर बिहार का लालू परिवार भी दायरे में आया।

आज मोदी ने चार बड़ी बातें कहीं-

  1. नेशन फर्स्ट की भावना छूटती जा रही: आज संविधान लिखना होता तो एक पेज भी नहीं लिख पाते-
    क्या कहा: संविधान बनाते वक्त देशहित सबसे ऊपर था। अनेक बोलियों, पंथ और राजे-रजवाड़ों को संविधान के जरिए एक बंधन में बांधा गया। मकसद था कि ऐसा करके देश को आगे बढ़ाया जाए। अगर ये आज करना होता तो शायद हम संविधान का एक पेज भी पूरा न लिख पाते, क्योंकि राजनीति के चलते नेशन फर्स्ट पीछे छूटता जा रहा है।
    क्यों कहा: संविधान दिवस सरकार के कैलेंडर में 1949 से, यानी 71 साल से है। लेकिन ये बड़ा आयोजन नहीं होता था। महज औपचारिकता निभाई जाती थी। केंद्र में NDA या यूं कहें कि भाजपा की सरकार आने के बाद 2015 से इसे बड़ा किया गया। इसके जरिये अंबेडकर और उन्हें मानने वालों को बड़ा स्पेस देने की कोशिश की गई।
  2. सत्ता जो परिवारों के हाथ होती गई: ये नहीं कह रहा कि परिवार के एक से ज्यादा लोग राजनीति में न आएं-
    क्या कहा: देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक जाइए। भारत एक संकट की तरफ बढ़ रहा है और वो है पारिवारिक पार्टियां। पार्टी फॉर द फैमिली, पार्टी बाई द फैमिली… और अब आगे कहने की जरूरत नहीं (हंसते हुए, सदन में बैठे लोगों की भी हंसी की आवाज…) लगती है। ये लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। संविधान हमें जो कहता है, यह उसके विपरीत है। जब मैं कहता हूं कि पारिवारिक पार्टियां, तो मैं ये नहीं कहता कि परिवार के एक से ज्यादा लोग राजनीति में न आएं। योग्यता के आधार पर और जनता के आशीर्वाद से आएं। जो पार्टी पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार चलाता रहे, वो लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट होता है।
    क्यों कहा: इस बात की धुरी में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव है, जो महज तीन से चार महीने बाद होना है। अखिलेश हों या प्रियंका दोनों परिवारवाद की मोदी परिभाषा की जद में हैं। कहने को ये कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला है। हालांकि नई परिभाषा में पारिवारिक राजनीति को छूट दी गई है, जिसकी अधिकता भाजपा समेत सभी पार्टियों में है।
  3. भ्रष्ट घोषित होने के बाद भी राजनीति में रहना-
    क्या कहा: समस्या तब शुरू होती है जब भ्रष्टाचार के लिए किसी को न्यायपालिका ने सजा दे दी हो और राजनीति के कारण उनका महिमामंडन चलता रहे। जब राजनीतिक लाभ के लिए लोकलाज छोड़कर, मर्यादा छोड़कर, उनका साथ दिया जाता है, तो लोगों को लगता है कि भ्रष्टाचार की प्राण प्रतिष्ठा की जा रही है। फिर उन्हें भी लगता है कि भ्रष्टाचार में चलना गलत नहीं है। गुनाह सिद्ध हुआ तो सुधरने का मौका दिया जाए, पर सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठा देने की प्रतिस्पर्धा चल रही है। यह नए लोगों को लूटने के रास्ते पर जाने के लिए प्रेरित करती है।
    क्यों कहा: भाजपा का यह कहती आ रही है कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार का बड़ा मामला सामने नहीं आया है। साथ ही इसके जरिये उत्तर प्रदेश में सपा, देश में कांग्रेस और बाकी राज्यों में छोटी पार्टियां घेरे में आती हैं। लेकिन अभी के लिहाज से सबसे अधिक फोकस यूपी पर है। ये कहन भी वहीं के लिए है, ताकि दूसरी पार्टियों के मुकाबले भाजपा को साफ-सुथरी कही जा कसे।
  4. अधिकार v/s कर्तव्य: कर्तव्य को जितनी निष्ठा से निभाएंगे, अधिकारों की उतनी ही रक्षा होगी-
    क्या कहा: आज जरूरी है कि हम कर्तव्य के माध्यम से अधिकारों की रक्षा के रास्ते पर चलें। कर्तव्य वो पथ है जो अधिकार को सम्मान के साथ दूसरों को देता है। कर्तव्य को जितनी ज्यादा मात्रा में निष्ठा से मानाएंगे, उससे सभी के अधिकारों की रक्षा होगी। ये कार्यक्रम सरकार, दल या प्रधानमंत्री का नहीं है। ये कार्यक्रम सदन का है, इस पवित्र जगह का है। स्पीकर और बाबा अंबेडकर की गरिमा है और हम इसे बनाए रखें।
    क्यों कहा: आजादी के बाद कांग्रेस के राजनीतिक तौर तरीकों पर सवाल उठाया गया है, जहां अधिकार पर अधिक जोर रहा। साथ ही किसान बिल वापसी का मामला भी। संसद सत्र शुरू होने को है, इसमें बिल वापसी होगी। वहां भी इशारा है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने इस बहाने कार्यक्रम का बहिष्कार करने पर कांग्रेस समेत 14 विपक्षी दलों पर तंज भी कसा है।

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