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ब्रेकिंग न्यूज: उपयंत्री को पांच साल की कठोर कैद, स्कूल में शौचालय निर्माण के मूल्यांकन करने के एवज में 30 हजार मांगी थी रिश्वत

छतरपुर। स्कूल में शौचालय निर्माण कार्य के मूल्यांकन करने के एवज में उपयंत्री के द्वारा 30 हजार रुपए की रिश्वत की मांग की गई। लोकायुक्त पुलिस ने उपयंत्री को रंगे हाथो 10 हजार रुपए रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। कोर्ट ने आरोपी उपयंत्री को पांच साल की कठोर कैद के साथ 30 हजार रुपए के जुर्माना की सजा सुनाई है। सजा सुजाने के बाद आरोपी को जेल भेज दिया है।  

एडवोकेट उत्कर्ष निगम ने बताया कि 13 अगस्त 2015 को फरियादी लखनलाल ने जनपद शिक्षा केंद्र राजनगर के उपयंत्री शिवराम निबोरिया के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस सागर को आवेदन दिया कि लखनलाल ने प्राथमिक शाला घुंचू में एक लाख 93 हजार पांच सौ रुपए का शौचालय निर्माण कार्य कराया है। जिसकी 25 प्रतिशत राशि मिलना बांकि है। उपयंत्री शिवराम के द्वारा मूल्यांकन करने के एवज में 30 हजार रुपए रिश्वत की मांग की जा रही है। फरियादी अब रुपए नही देना चाहता है। उपयंत्री को रंगे हाथों पकड़वाना चाहता है।

लोकायुक्त पुलिस ने लखन को वॉयस रिकॉर्डर देकर उपयंत्री की रिश्वत मांगने की बात रिकॉर्ड कराई। 25 अगस्त को रिश्वत की राशि दस हजार रुपए लखन को देकर लोकायुक्त पुलिस राजनगर पहंुची। पुरानी जनपद राजनगर के कैंपस में उपयंत्री शिवराम ने लखन से 10 हजार रुपए लेकर अपनी पेंट की जेब में रख लिया। लखन के इशारा करने पर लोकायुक्त पुलिस ने घेराबंदी करके उपयंत्री को रंगे हाथो पकड़ा और मामले की विवेचना कर मामले को कोर्ट में पेश किया।

विशेष न्यायाधीश सुधांशु सिन्हा की अदालत ने सुनाई सजा-
अभियोजन की ओर से विशेष लोक अभियोजक केके गौतम ने पैरवी करते हुए सबूत और गवाह कोर्ट के सामने पेश किए। और कोर्ट में दलील रखी कि भ्रष्टाचार समाज के लिए बहुत घातक है। आरोपी को कठोर से कठोर सजा दी जाए। विशेष न्यायाधीश सुधांशु सिन्हा की अदालत ने फैसला सुनाया है कि लोकसेवको के द्वारा भ्रष्टाचार किया जाना एक विकराल समस्या हो गई है। जो समाज को खोखला कर रही है। भ्रष्टाचार लोकतंत्र और विधि के शासन की नीव को हिला रहा है। ऐसे मामलो में आरोपी को सजा देते समय नम्र रुख अपनाया जाना विधि की मंशा के विपरीत है और भ्रष्टाचार के प्रति कठोर रुख अपनाया जाना समय की मांग है। कोर्ट ने आरोपी उपयंत्री शिवराम निबोरिया को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 में चार साल की कठोर कैद 15 हजार रुपए जुर्माना और धारा 13(1)(डी)/13(2) में पांच साल की कठोर कैद के साथ 15 हजार रुपए के जुर्माना की सजा सुनाई।

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