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भविष्य की आहट: देश की इन्द्रधनुषीय आभा पर वोटबैंक की राजनीति का ग्रहण, लेखक- डा. रवीन्द्र अरजरिया की कलम से

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डेस्क न्यूज। देश की राजधानी में बढते प्रदूषण के लिए दीपावली के पटाकों को जिम्मेवार माना जा रहा है। संचार माध्यमों पर बहस चल रही है। शासन और प्रशासन इस हेतु उत्साही हिन्दुओं को दोषी ठहरा रहा है। कार्यवाही की बात कही जा रही है। पराली के जलाने से प्रदूषण फैलने की स्थितियां उन्हें नहीं दिखतीं। कथित यांत्रिक आंकडों के आधार पर हायतोबा मचाने वाले कथित आधुनिकतावादी केवल और केवल सामाजिक सौहार्द में चिंगारी लगाने की फिराक में रहते हैं।

ऐसा तभी होता है जब कोई पर्व, त्यौहार या परम्परागत उत्सव का समय आता है। उल्लास के पर्व दीपमालिका के अलावा भाईचारे के त्यौहार होली पर पानी का बरबादी की नसीहत दी जाती है। पानी बचाओ का नारा देने वाले स्वयं अपनी लग्जरी गाडियों की धुलाई पर रंगों के उत्सव से कहीं ज्यादा पानी रोज ही खर्च करते हैं। कभी छठ पूजा का विरोध तो कभी दशहरे के रावण दहन पर आपत्ति। कभी नवरात्रि में मूर्ति स्थापना पर बवाल तो कभी रामनवमी की रैली पर रोक। कभी गणपति विसर्जन के लिए निदेश जारी तो कभी कार्तिक पर्व पर पावन्दियां।

इस तरह के प्रयोगवादी लोग आखिरकार विश्व की सबसे पुरानी संस्कृति को ही निशाना क्यों बनाते हैं? उत्तर साफ है सनातनी जीवन शैली अपनाने वालों की सहनशक्ति की परीक्षा लेना तथा समाज के भाईचारे के मधुर वातावरण में जहर घोलना। इतिहास गवाह है कि इस तरह के प्रतिबंध लगाने के लिए कभी भी पडोसियों ने आपत्ति दर्ज नहीं करायी बल्कि अकूत सम्पत्ति के ढेर पर बैठे समाज के कथित ठेकेदारों, उनके चमचों और विघ्नसंतोषी लोगों ने अपने विदेशी आकाओं के इशारे पर देश में अस्थिरता लाने हेतु हमेशा ही कोशिशें की हैं। इनकी इन कोशिशों को किन्ही खास कारणों से मीडिया की सुर्खियां बनते भी देर नहीं लगती।

देशहित को तिलांजलि देकर टीआरपी और लोकप्रियता के शीर्ष पर पहुंचने की आड में कुछ सिरफिरे लोगों की अनर्गल बातों को प्रमुखता से प्रचारित किया जाता है। एक स्थान के अधिकांश निवासी आज भी भाईचारे से रहना चाहते हैं परन्तु उन्हें रहने नहीं दिया जाता है। कभी भडकाऊ संदेशों के माध्यम से तो कभी धर्मगुरुओं के उत्तेजक भाषणों से लोगों को बरगलाने का प्रयास किया जाता रहा है। सत्य को जाने बिना ही कौवा कान ले गया, ले गया, ले गया की चीखें गूंजने लगतीं है। चीखें सुनकर लोग अपनी छाती पीटने लगते हैं जबकि कान तो अपनी जगह मौजूद ही रहता है। मगर उसे न तो लोग देखते हैं और न देखने दिया जाता है।

दिल्ली के प्रदूषण के लिए हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने वाले ही उत्तरदायी हैं। मगर उन पर कोई कार्यवाही न करके उत्सवों को कोसना शुरू कर दिया जाता है। वास्तविकता तो यह है कि पंजाब और हरियाणा में सबसे ज्यादा हार्वेस्टर से फसलों की कटाई होती है। इस प्रक्रिया में केवल बालियां ही निकाली जातीं है और फसल का शेष भाग छोड दिया जाता है। ऐसे में तीन तरफ से नुकसान झेलना पडता है। पहला तो फसल के तने से निकलने वाला भूसा ही नहीं मिलता जिसके कारण पशुओं की भोजन समस्या विकराल होती जा रही है।

पशु अपने उदर पोषण हेतु सडकों पर मारे-मारे फिर रहे हैं। दूसरा कारण है फसल हेतु खेत तैयार करने के लिए पराली को हटाने की समस्या जिसके लिए उसे जलाने के अलावा कोई दूसरा सस्ता रास्ता नहीं दिखता और तीसरा फसल काटने के लिए दूर दराज से आने वाले मजदूरों का रोजगार ही छीन लिया जाता है। हार्वेस्टर का यह रोग अब हरियाण-पंजाब से निकल कर पूरे देश में फैल रहा है। बिना नम्बर के हार्वेस्टर वाहन राष्ट्रीय राजमार्गों पर धडल्ले से दौडते हुए दलालों के माध्यमों से सूदूर अंचल के किसानों के खेतों तक पहुंच रहे हैं। उनके लिए न तो परिवहन नियम ही आडे आते हैं और न ही यातायात पुलिस की चौकसी।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में तो इन हार्वेस्टर गिरोहों ने गांव-गांव में अपने दलाल पैदा कर दिये हैं जो किसानों को जल्दी फसल कटने, खर्च कम आने की इबारत पढाते हैं। हार्वेस्टर के पहले कभी पराली की समस्या नहीं थी। टैक्टर के उपयोग के पहले कभी पशुओं की समस्या नहीं थी। गाय से दूध और बैल से खेती का सामंजस्य था। मजदूरों को गांव में ही रोजगार मिलता था। विकास के मायने बेरोजगारी को बढावा देना कदापि नहीं होता। दिल्ली दरवार से लेकर प्रदेश मुख्यालयों पर वेतन के रूप में लाखों रुपये लेने वाले विव्दान अधिकारियों ने कभी भी दूरगामी नीतियों पर काम ही नहीं किया अन्यथा आधुनिकता की अंधी होड में बेराजगारों की लम्बी फेरिश्त तैयार ही नहीं होती।

सडकों के विस्तार के अनुरूप ही वाहनों को खरीदने की अनुमति, बाजार में दुकानों की क्षमता के अनुरूप ही व्यापारिक संस्थानों का पंजीयन, छात्रों की संख्या के अनुरूप व्यवसायिक प्रशिक्षण, खेत की मिट्टी के अनुरूप उर्वरकों का प्रयोग, गुणवत्ता के अनुरूप उन्नत बीजों का प्रचलन, लागत के अनुरूप लाभांश का निर्धारण, जनसंख्या विस्तार के आधार पर शिक्षा के पाठ्यक्रम का निर्धारण जैसे अनगिनत कारक है जिन पर  उत्तरदायी अधिकारियों के कर्तव्यों का निर्धारण होना चाहिए। परन्तु हो यह रहा है कि प्रत्येक विभाग के वातानुकूलित मुख्यालयों में बैठे भारी-भारी पगार लेने वाले बुध्दिजीवी अधिकारी कभी राजस्व बढाने के लिए नये टैक्स लागू कर देते हैं तो कभी आधुनिकता की आड में नये नियमों को पिटारा फोड देते हैं और एक बार फिर शुरू हो जाता है नूतन व्यवस्था के नाम पर मध्यम वर्गीय ईमानदार कर दाताओं के खून की अतिरिक्त बूंदें चूसने का क्रम। सामाजिक सरोकारों से लेकर व्यवस्था तक मनमानियों का खुला तांडव हो रहा है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी आदि की अपनी परम्परागत जीवन शैली, मान्यतायें, आदर्श, सिध्दान्त इस देश का इंद्रधनुषीय आभा मण्डल है परन्तु उसे वोट बैंक की राजनीति ने न केवल दूषित कर दिया बल्कि उसकी किस्तों में हत्या करना शुरू दी है। देश में कुछ ही लोग होंगे जिन्हें अपने पडोस में रहने वाले अन्य धर्म के अनुयायी से परेशानी होगी। ऐसे में औबैसी, राहुल, अखिलेश, उमा, माया, ममता, स्मृति, नबाब, स्वामी, दिग्विजय जैसे लोगों का पैसों और संसाधनों की दम पर समाज का स्वयंभू ठेकेदार बन जाना किसी भी हालत में देश के हित में नहीं कहा जा सकता।

विश्लेषण के बिना हाय-हाय मचाने का प्रयास निश्चय ही किसी सोचे-समझे षडयंत्र की ओर इशारा करता है। गुडगांव में खुले में नमाज पढने जैसे मुद्दे उठ खडे हुए। फिर खुले में गोवर्धन पूजा की परम्परा भी डालने वाले भी सामने आ गये। जो जहां काम काम करते है वहीं नमाज भी पढ सकता है। घर के दरवाजे पर गोवर्धन पूजा की जा सकती है। मगर उकसावे की राजनीति करने वाले हमेशा ही माचिस की डिब्बी अपने पास रखते हैं। ऐसे लोगों को चिन्हित करने का काम  अब आम आदमी को स्वयं करना होगा। गली, मुहल्लों, गांवों, चौबारों की छोटी इकाइयों को आपस में मिलकर सौहार्द का वातावरण बनाना होगा और करना होगा संचार माध्यमों से व्देष फैलाने वालों का उपचार। तभी देश के इन्द्रधनुषीय आभा मण्डल को वोटबैंक की राजनीति के ग्रहण से बचाया जा सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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