Home आध्यात्मिक लगाए गए वृक्ष ही पुत्ररूप में प्राप्त हो जाते हैं

लगाए गए वृक्ष ही पुत्ररूप में प्राप्त हो जाते हैं

डेस्क न्यूज। शिवपुराण के “उमा संहिता” के 12 वें अध्याय के 17 वें और 18 वें श्लोक में ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारों ने ऋषियों से कहा।

अतीतानागतान् सर्वान् पितृवंशांस्तु तारयेत्।
कान्तारे वृक्षरोपी यस्तस्माद् वृक्षांस्तु रोपयेद्।।17।।

सनत्कुमारों ने कहा कि हे ऋषियो! वृक्षारोपण करनेवाले स्त्री पुरुषों के पितरों का तरणतारण हो जाता है।
जो स्त्री पुरुष,फलदार, छायादार वृक्षों का रोपण करते हैं, ऐसे स्त्री पुरुषों के पूर्वज यदि नरक में अपार दुख भोग रहे होंगे तो वे सभी नरक से, तथा मलभोजी सुअर आदि कुत्सित योनियों से मुक्त हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को वृक्षारोपण करना चाहिए। जिस मार्ग में वृक्षों का अभाव हो,उस मार्ग में वृक्षों का आरोपण अवश्य करना चाहिए।

अतीतानागतान् सर्वान् पितृवंशांस्तु तारयेत्।
वृक्षारोपण करने से, अतीत अर्थात पूर्व के पूर्वज दादा,परदादा आदि, तथा आगतान् अर्थात अपने वंश में आनेवाले पुत्र, पौत्र, पौत्री आदि ये सभी तर जाते हैं।

माता पिता ने अपने पुत्र पुत्री के मोह में आकर विविध प्रकार से झूठ बोला होगा। किसी का कुछ ऋण लेकर न दिया होगा। संतानों के मोह में आकर अपने ही भाई, बहिन, चाचा, माता पिता आदि के साथ दुर्व्यवहार किया होगा। या कभी किसी भयानक परिस्थितियों से मुक्त होने के लिए भी कुछ विपरीत कर्म किए होंगे, इत्यादि अनेक प्रकार के पाप जाने अनजाने में हो ही जाते हैं।

संतान तो सुखी हो जाती है, किन्तु माता पिता को तो उस उस कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। यदि संतान निर्धन होने के कारण श्राद्ध, सत्कर्म, दान,पुण्य आदि नहीं कर पाती है तो वह वृक्षरहित मार्ग में वृक्षों का रोपण कर दे तो उसके माता पिता, दादा दादी आदि पूर्वजों की दुखों से मुक्ति हो जाती है।

अनागत अर्थात जो अभी आए ही नहीं हैं। यदि कोई स्त्री पुरुष,संतान होने के पूर्व ही पीपल,बरगद आदि जैसे छायादार,दीर्घजीवी वृक्षों को लगाता है तो उसकी आनेवाली संतान भी सेवाभावी, परोपकारी,दयालु और धार्मिक संतान होती है। इसलिए एकान्त मार्ग में वृक्षों रहित मार्ग में वृक्षों को लगाना चाहिए।

अब 18 वें श्लोक में एक विशिष्ट चमत्कारी बात सुनिए।
तत्र पुत्रा:भवन्त्येते पादपा नात्र संशय:।
परं लोकं गत:सोsपि लोकानाप्नोति चाक्षयान्।।18।।

वृक्षारोपण करनेवाले स्त्री पुरुषों के यहां ही लगाए गए वृक्ष ही पुत्ररूप में पुत्रीरूप में जन्म ले लेते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है।
जो स्त्री पुरुष, वृक्षारोपण करते हैं,उनका शरीर छूटने के बाद उसको अक्षयलोक की प्राप्ति होती है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता है।

कितनी विलक्षण, अद्भुत, आश्चर्यकारी, बात है ये।
तत्र पुत्रा: भवन्त्येते पादपा नात्र संशय।

यदि आपके किसी पूर्वज ने आम,पीपल, बरगद आदि फलदार, छायादार,दीर्घजीवी वृक्षों को लगाया है। यदि उनके वंश में किसी पुत्र या पुत्री के संतान नहीं हो रही होगी,या उसके भाग्य में ही संतान नहीं होगी तो,वे वृक्ष ही अपने आप ही सूखकर अपने प्राणों को समाप्त करके उसकी वंशवृद्धि के लिए उसके घर में ही पुत्र पुत्री के रूप में जन्म ले लेते हैं।

वृक्षारोपण करनेवाले स्त्री पुरुष ने जैसे उस वृक्ष को लगाकर उसके वंशवृद्धि में सहयोग किया है,उसी प्रकार वे वृक्ष भी उन स्त्री पुरुषों के वंश में जन्म लेकर उसके वंश की वृद्धि करते हैं।

अर्थात आपका किया गया कोई भी पापकर्म व्यर्थ नहीं जाता है तो भला पुण्यात्मक किया गया कर्म कैसे व्यर्थ हो जाएगा?। जैसे पापकर्म करने के अनेक प्रकार के कर्म होते हैं,इसी प्रकार पुण्य कर्म करने के भी अनेक प्रकार होते हैं। जो कार्य सभी को सुख शांति देते हैं,उनको ही पुण्यकार्य कहते हैं। तथा जो कार्य सभी को दुख और अशांति देते हैं,वही कार्य पापकर्म कहे जाते हैं।

19 वें श्लोक में देखिए कि वृक्षारोपण करने से क्या होता है?
पुष्पै:सुरगणान् सर्वान् फलैश्चापि तथा पितृन्।
छायया चातिथीन् सर्वान् पूजयन्ति महीरुहा:।।19।

पुष्पवाले पौधे वृक्ष लगाने से देवगणों की पूजा होती है,देवता प्रसन्न होते हैं।फलदार वृक्षों को लगाने से पितर लोग प्रसन्न होते हैं। छायादार दीर्घजीवी वृक्षों को लगाने से अतिथि,यात्री लोग प्रसन्न होते हैं।

अर्थात जब आप किसी भी प्रकार का वृक्ष लगाएंगे तो अवश्य ही उस वृक्ष की लकड़ी,पुष्प,छाया,फल, फूल कुछ न कुछ सभी के काम आता है। पक्षियों को निवास स्थान प्राप्त होता है। पक्षियों का निवास तो वृक्षों पर ही होता है। पक्षियों को वासदान करने का भी फल प्राप्त होता है।

मही अर्थात पृथिवी,रुह अर्थात उत्पन्न होनेवाला। महीरुह अर्थात पृथिवी में उत्पन्न होनेवाला वृक्ष। इसलिए बिना धन के ही अपने शरीर से किया जानेवाला सबसे बड़ा पुण्य का कार्य तो वृक्ष लगाना है। वृक्षारोपण करनेवाले स्त्री पुरुषों को सदा ही सुख शांति समृद्धि तथा सर्वदान करने का पुण्य फल प्राप्त होता है। वृक्ष लगाइए,सभी प्रकार के दान का फल पाइए।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

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