Home आध्यात्मिक वेदपुराण विरुद्ध, पुस्तकों को पढ़ने से कल्याण नहीं होता है

वेदपुराण विरुद्ध, पुस्तकों को पढ़ने से कल्याण नहीं होता है

डेस्क न्यूज। कूर्मपुराण के पूर्वभाग के 11 वें अध्याय के 271 वें श्लोक में और 272 वें श्लोक में भगवती पार्वती जी ने अपने पिता हिमालय को ज्ञानोपदेश करते हुए,अज्ञानियों के द्वारा अपनी कल्पना से कहे गए वेदपुराण विरुद्ध वार्ताओं से दूर रहने के लिए विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि।

न च वेदाद् ऋते किञ्चिच्छास्त्रधर्माभिधायकम्।
योsन्यत्र रमते सोsसौ न सम्भाष्यो द्विजातिभि:।।271।।

भगवती पार्वती जी ने कहा कि हे हिमालय! इस संसार में स्त्री पुरुषों के धर्म और कर्तव्य को यथार्थरूप से बतानेवाले वेदों के अतिरिक्त दूसरा कोई भी नहीं है। वेदों में ही धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष के विषय में विशुद्ध मार्ग बताया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को वेदों के अनुसार ही समय समय पर अपने ब्रह्मचर्य, गृहस्थ वानप्रस्थ और संन्यास के नियमों का पालन करना चाहिए।

जो मनुष्य विविध प्रकार की युक्तियां देकर,तर्क देकर वेदों की निन्दा करते हैं, और किसी अन्य को भगवान बताकर,तथा अधर्म को ही धर्म मानकर संसार में भ्रम उत्पन्न करते हैं, ऐसे स्त्री पुरुषों से, किसी भी प्रकार से सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए।
वेदमार्ग में चलनेवाले ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को ऐसे कपोल-कल्पित,वेदविरोधी बात करनेवाले का त्याग ही कर देना चाहिए। सभी जातियों के स्त्री पुरुषों के धर्म और सत्कर्म, कर्तव्य तथा नीति अनीति,का ज्ञान एकमात्र वेदों में ही बताया गया है, और कहीं नहीं बताया गया है।

न च वेदाद् ऋते किञ्चिच्छास्त्रधर्माभिधायकम्।
संसार में,वेदों शास्त्रों के अतिरिक्त धर्म को बतानेवाले और कोई शास्त्र होते ही नहीं हैं। वेद पुराण ही शास्त्र कहे जाते हैं, किसी मनुष्य के द्वारा लिखे गए वाक्यों को शास्त्रवाक्य नहीं कहा जा सकता है।

भारतीय अभारतीय सभी स्त्री पुरुषों को भगवती पार्वती जी की इस बात पर विचार करना चाहिए कि – संसार में ऐसा कौन सा मनुष्य उत्पन्न हो सकता है,जो सभी प्राणियों के कल्याण के साधन बता सकता हो? वेदों के अतिरिक्त किसी भी मनुष्य में इतनी बुद्धि हो ही नहीं सकती है कि वह सभी का कल्याण कर सके। सभी स्त्रियों और पुरुषों के सम्पूर्ण जीवन के कल्याणकारी मार्ग दिखा सके।

एक मनुष्य का जीवन ही व्यतीत हो जाएगा किन्तु सभी के लिए समान रूप से हितकारी कल्याणकारी कुछ भी नहीं लिख सकता है। सभी स्त्रियों पुरुषों के आयु के अनुसार धर्म का निर्णय,पिता,पति,पत्नी, पुत्र पुत्री, आदि सभी सम्बन्धों का धर्म निर्णय, संन्यास आश्रम के धर्म का निर्णय,राजा अर्थात शासक की नीतियों कर्तव्यों का निर्णय,आदि विविध प्रकार के धर्मों का निर्णय करना ,अतिविशाल निर्णय करना संसार के किसी भी मनुष्य में सामर्थ्य नहीं है।

इसलिए प्रत्येक भारतीय धार्मिक को यह बात हृदय में बैठा लेना चाहिए कि सनातन धर्म के विषय का निर्णय, एकमात्र वेदों में, पुराणों में तथा धर्मशास्त्रों में ही लिखा है। वेदों पुराणों में लिखे हुए धर्म का ही यथाशक्ति पालन करना चाहिए।

यहां वहां के अज्ञानी स्त्री पुरुषों की बातों को मानकर वेदों पुराणों की निंदा नहीं करना चाहिए, और न ही ऐसे वैसे कलियुगी पंथों की बात मानकर अपने धर्म का त्याग करना चाहिए। अब 272 वें श्लोक में देखिए कि इन मनुष्य निर्मित पंथों और संप्रदायों की पुस्तकों से कल्याण क्यों नहीं होता है?

यानि शास्त्राणि दृश्यन्ते लोकेस्मिन् विविधानि तु।
श्रुतिस्मृतिविरुद्धानि निष्ठा तेषां हि तामसी।।272।।

श्रुति अर्थात वेद, और स्मृति अर्थात धर्मशास्त्र, मनुस्मृति आदि को धर्मशास्त्र कहते हैं। *इस संसार में वेदों के विरुद्ध मार्ग बताने वाले, शास्त्र के समान दिखाई देनेवाले ग्रंथ हैं, और धर्मशास्त्रों के समान धर्मशास्त्र नियम बतानेवाले ग्रंथ हैं, ये सभी तामसी शास्त्र हैं।

वेदों और धर्मशास्त्रों को निरर्थक और व्यर्थ बतानेवाले शास्त्रकर्ताओं का उद्देश्य तो एकमात्र स्त्री पुरुषों को भ्रमित करके भोग,भोजन तथा सुविधाओं को एकत्रित करना ही है।

हमारा सम्प्रदाय बढ़ जाए,धन जन की वृद्धि हो जाए,ऐसी ही कामना रहती है। इसलिए इनकी निष्ठा संसार में ही होने के कारण इसको तामसी निष्ठा कहा जाता है। वेदों शास्त्रों में तो ऐसे धर्म का और ऐसे ज्ञान का उपदेश दिया गया है कि मनुष्य की मुक्ति हो जाए। जन्ममरण का चक्र ही समाप्त हो जाए।

वर्तमान के कलियुग पंथों और सम्प्रदायों में जितने भी कार्यकर्ता हैं,वे सभी अज्ञानी हैं। उनकी तो यही इच्छा रहती है कि स्त्री पुरुष सभी हमारे सम्प्रदाय में आ जाएं और हमारे गुरु को ही भगवान मानें।

श्री राम और कृष्ण आदि भगवान नहीं हैं,हमारे गुरु ही भगवान हैं। ऐसा कहनेवाले संस्कृत भाषा के ज्ञान से रहित होते हैं। जिनको संस्कृत भाषा का ही ज्ञान नहीं होता है तो, वह क्या जानें कि गीता, भागवत,रामायण,वेद और पुराणों में क्या लिखा है?

इसलिए भगवती पार्वती जी ने कहा कि शास्त्रों जैसे दिखाई देनेवाले ग्रंथ को नहीं पढ़ना चाहिए। जो मानव समाज, किसी मनुष्य को ही भगवान मानकर पूजने में लगे हुए हैं,ऐसे व्यक्तियों को भी नहीं मानना चाहिए और न ही किसी ऐसे बनाए गए भगवान,मनुष्य की आराधना करना चाहिए। शास्त्रों में, वेदों में जो भगवान के नाम कहे गए हैं, भगवान के उन्हीं नामों का जप करने से और कीर्तन करने से कल्याण होगा।

किसी मनुष्य को भगवान मानकर संस्कृत भाषा में लिखे हुए मंत्र तो नकली ही हैं। वह भगवान भी नकली है, और उसके बनाए हुए मंत्र भी नकली हैं। भारतीय समाज को अपने वेद, पुराण और धर्मशास्त्रों में बताए गए व्रत उपवास आदि करना चाहिए,इसी में कल्याण है।

(विचारक- आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

खून से लथपथ मिली थी पल्लेदार की लाश, परिजनों को हत्या की आशंका

मध्यप्रदेश। दमोह जिला मुख्यालय के नया बाजार नंबर 3 में रहने वाले एक बुजुर्ग पल्लेदार का शव कचोरा...

मजदूरी कर लौट रहा था युवक, आरोपी ने गाली देकर शुरू किया विवाद, मारी चाकू

मध्यप्रदेश। दमोह कोतवाली थाने के बड़ापुरा इलाके में रविवार रात मजदूरी कर लौट रहे युवक को पड़ोसी ने...

फूड पॉइजनिंग से 2 बच्चियों की मौत, 12 की हालत गंभीर

मध्यप्रदेश। छिंदवाड़ा जिले के पांढुर्णा में फूड पॉइजनिंग से दो बच्चियों की मौत हो गई। दोनों ने शादी...

धर्मांतरण मामले में गृहमंत्री का एक्शन, इंटेलिजेंस को प्रदेश के सभी मिशनरी स्कूल पर नजर रखने को कहा

मध्यप्रदेश। भोपाल में सामने आई धर्मांतरण की घटना के बाद मध्यप्रदेश में संचालित सभी मिशनरी स्कूल सरकार की...

Recent Comments

%d bloggers like this: