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सोचिए! कथा का वक्ता ऐसा होना चाहिए

डेस्क न्यूज। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड के 91 वें दोहे की पहली और दूसरी चौपाई में कागभुशुण्डि जी ने गरुड़ जी से कहा कि।
निज मति सरिस नाथ मैं गाई।
प्रभु प्रताप महिमा खगराई।।

कागभुशुण्डि जी ने कहा कि खगनाथ!पक्षिराज गरुड़ जी!आप तो भगवान नारायण के साक्षात् वाहन ही हैं। आपके आगे भला मैं भगवान की कथा का वर्णन तथा उनके लीला चरित्रों का वर्णन क्या करूं? फिर भी-।

निज मति सरिस नाथ मैं गाई।
मैंने आपको भगवान की कथा जो भी, जितनी भी,जैसी भी सुनाई है,वह निष्कपट, निश्छल भाव से ही सुनाई है।
भगवान श्री राम जी के सम्पूर्ण स्वरूप को बताना,उनके सम्पूर्ण उद्देश्य को बताना, तथा उनके सम्पूर्ण चरित्रों को बताना तो किसी की भी बुद्धि में सामर्थ्य नहीं है, फिर भी मेरे जितनी बुद्धि थी,जहां तक बुद्धि की गति थी,वहांतक तो मैंने आपको सुना ही दिया है।

प्रभु प्रताप महिमा खगराई।
हे खगराज! वास्तव में अभी तक जो भी मैंने सुनाया है, उसमें मात्र दो ही प्रकार बताए हैं।

(1)प्रभुप्रताप और (2) प्रभु की महिमा-
किसी के विषय में जब भी कोई कुछ चरित्रों को सुनाता है तो उन चरित्रों से उनके प्रताप अर्थात अपराजित प्रभाव तेज का वर्णन होता है, तथा बलवान और सामर्थ्यवान होते हुए भी अपने से छोटे निर्बलों को सम्मान देना तथा बड़े से बड़े अहंकारी अत्याचारी के सामने युद्ध के लिए तत्पर होकर उसका विनाश करना,यही तो महिमा है।

ब्राह्मणों,ऋषियों मुनियों की रक्षा करने से ही धर्म की रक्षा होती है। क्यों कि धर्म और सदाचार का आचरण, एकमात्र ब्राह्मण ऋषि मुनि ही तो करते हैं।

तपस्या, स्वाध्याय, वेदाध्ययन आदि करनेवाले ब्राह्मणों में ही धर्म का यथार्थ स्वरूप दिखाई देता है।
तपस्या तो रावण कुंभकर्ण आदि राक्षसों ने भी की थी, किन्तु वह तपस्या तो बलप्राप्त करके भोगवासनाओं की पूर्ति के लिए ही की थी। उनकी तपस्या से धर्म का नाश ही हुआ है। भोगों की वृद्धि ही हुई है। भोगों की वृद्धि से अधर्म की वृद्धि होती है।

निर्बलों को सताकर स्त्री पुरुषों को धर्म से भ्रष्ट करने के लिए वह तपस्या की थी। इसलिए ऐसी तपस्या को धर्म नहीं कहते हैं।

यावज्जीवन तपोमय,सदाचारमय, स्वाध्यायमय,सरलता से जीवन को व्यतीत करना ही धर्म है।

ऐसे धर्मधारी ब्राह्मणों की रक्षा के लिए,तथा आत्मज्ञान सम्पन्न महात्माओं की रक्षा के लिए भगवान का अवतार होता है।

इस प्रकार भगवान की महिमा तथा उनका प्रताप वर्णन मैने कर दिया है।
रावण आदि को मारने में भगवान का प्रताप प्रगट होता है, और महात्माओं ब्राह्मणों की रक्षा करने से उनकी महिमा का ज्ञान होता है।

अब दूसरी चौपाई पर विशेष ध्यान देने योग्य है।
कहेउं न कछु करि जुगुति विसेषी।

यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।।कागभुशुण्डि जी ने कहा कि हे गरुड़ जी!

कहेउं न कछु करि जुगुति विसेषी-
आपको प्रसन्न करने के लिए अथवा अपनी बुद्धिमत्ता दिखाने के लिए मैंने कोई भी कैसी भी युक्ति नहीं लगाई है। आत्मप्रसंशा प्राप्त करने के लिए,तथा धन प्रतिष्ठा और यश प्राप्त करने के लिए तथा श्रोता को प्रसन्न और प्रभावित करने के लिए ही वक्ता अनेक युक्तियों का उपयोग करते हैं। जो वक्ता ऐसी युक्तियों का उपयोग करते हैं, समझिए वह तो भगवान की कथा को पीछे छोड़कर तथा भगवान से अपने मन को हटाकर मात्र अपने लिए ही कथा को कर रहे हैं।अपने यश,धन, प्रतिष्ठा तथा विद्वता दिखाने के लिए ही कथा कर रहे हैं।

यह सब मैं निज नयनन्हि देखी-
कागभुशुण्डि जी ने कहा कि हे गरुड़ जी!आदि से अंत तक जो भी मैंने भगवान श्री राम जी के विषय में सुनाया है, वे सभी चरित्र तथा वे सभी लीलाएं भी मैंने अपने नेत्रों से ही देखीं हैं। सुनी सुनाई कथा नहीं सुनाई है। इसलिए कोई युक्ति लगाने की आवश्यकता ही क्या है?वो तो सब मैंने देखा ही है।जो देखा है,वही वर्णन किया है।

जिस वक्ता ने अपने विद्वान ब्राह्मण गुरु से शास्त्रों का अध्ययन किया होगा, गुरुजनों की श्रद्धा समर्पण से सेवा की होगी,वही वक्ता ही रामायण, गीता, भागवत आदि में लिखे हुए भगवान के यथार्थ लीला चरित्रों के विषय में कुछ यथार्थ जानते हैं। शेष वक्ता तो जो अपनी शोभा के लिए, प्रतिष्ठा के लिए तथा धनवैभव एकत्रित करने के लिए कथाओं को रुचिकर बनाने के लिए विविध युक्तियों को अपनाते हैं और यजमानों को प्रसन्न करने के लिए युक्तियां अपनाते हैं, उनके मुख से भगवान की कही हुई कथाएं मात्र कथाएं ही हैं। उनकी कथाओं से भगवान का प्रताप तथा भगवान की महिमा का ज्ञान नहीं होता है।

विद्वान,भक्तिमान, परम्परा प्राप्त महापुरुष के मुख से सुनी हुई भगवान की कथा ही मन बुद्धि चित्त को शुद्ध करने में समर्थ है। बाकी तो सभी अपने लिए ही कथा कर रहे हैं।

लेखक व विचारक आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावनधाम।

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