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हम सभी को सत्य असत्य क़ा पता होता है उसके बावजूद हम लोग अन्मयस्क जीवन जीते हैं, अधिकाँश लोग झूठ-फरेब क़ा जीवन जी रहे हैं, दरअसल हमारे लाख कोशिश करने के बाद भी हम किसी क़ा प्रारब्ध नही बदल सकते हैं, जब तक हम साधक बनकर माँ गुरुवर की साधना नही करेंगे तब तक हमारे जीवन शैली में परिवर्तन हो ही नही सकता है

डेस्क न्यूज। पिछले कुछ महीनों में बहुत सारे लोगों की मृत्यु हो गयी, बहुत सारे परिवार उजड़ गऐ, अनेक लोगों के रोजगार छिन गए,फिर भी लोग पुराने ढर्रे पर ही चल रहे हैं। वर्तमान परिवेश में आप किसी की कितनी मदद कर दीजिए, उसको हर प्रकार के मुश्किलों से बचा लीजिए फिर भी वो व्यक्ति राहत मिलते ही आपके साथ दुर्व्यवहार जरूर करेगा। कलिकाल अपने चरम पर है।कोई किसी की सुनने को कत्तई राजी नही है।

लोगों में धैर्य बचा ही नही है। गलती से किसी को आपने समझाने के लिए कुछ बोल दिया तो तत्काल बेइज्जती करने पर उतारू हो जाते हैं। लोग बच्चों को संस्कार नही दे रहे हैं। अनेक युवक युवतियों को अपने से बड़ों क़ा आदर सम्मान करना आता ही नही है।जब हम अपने बच्चों को सँस्कार नही दे पा रहे हैं तो अन्य को कैसे बोल पाएँगे।कई लोग हताश और निराश होकर हारकर बोलते हैं कि हमारा बच्चा हमारी बात नही मानता है। आखिर इसकी नींव भी हमने ही रखी है। जब वो छोटा था या थी तब तो हमने ध्यान दिया नही अब जब पानी सिर से ऊपर जाने लगा तो हम चिंतित हो रहे हैं। अभी भी वक्त है। अपने बच्चों को गुरुदेव जी की विचारधारा से जोड़िये। शिविर और महा आरती में नियमित रूप से ले जाइए।

आप देखेंगे की बच्चों में अकल्पनीय परिवर्तन देखने को मिलेगा। सर्वप्रथम हमें स्वयं के आचार व्यवहार में परिवर्तन लाना होगा। झूठ फरेब से सदा-सदा के लिए दूरी बनानी होगी। अन्दर और बाहर दोनों से साफ रहना होगा। लोगों के प्रति प्रेम की भावना रखना आवश्यक है। राग, द्वेष क़ा जीवन त्यागना होगा। दूसरों को कुछ भी कहने से पहले अपने गिरेबान में हमें झांकना चाहिए। गुरुदेव जी ने कहा है कि आपको एक साधक क़ा जीवन जीना होगा। एक साधक क़ा जीवन तपस्यात्मक जीवन होता है। भौतिक जीवन की अत्यधिक लिप्तता हानिकारक है। वासना के वशीभूत होकर जीवन को हम कलुषित करते जा रहे हैं। वासना तो बड़े-बड़े राजाओं महा राजाओं को निगल गई तो आप और हम एक साधारण मनुष्य हैं।वासनारत मनुष्य दिन के उजाले में ही आँख की रोशनी खो देता है अर्थात वो अंधा हो जाता है।उसे सत्य असत्य क़ा भान रहता ही नही। मनुष्यों में आसक्ति तो निरर्थक है।

माँ गुरुवर के क्रमों में इतनी ऊर्जा हम खर्च करें तो हमारा सम्पूर्ण जीवन शानदार हो जाय। जिस प्रकार से एक गन्दे घर को साफ करने के लिए हम झाड़ू, पोछा और अनेक प्रकार के सफाई के उपकरण क़ा प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार से कलुषित मन को साफ और निर्मल बनाने के लिए नियमित रूप से माँ गुरुवर की साधना करना होगा। आत्मा की निर्मलता से ही जीवन में आनन्द क़ा प्रादुर्भाव होता है। आत्मा की शुद्धता से ही परमात्मा (माँ दुर्गा जी) की कृपा प्राप्त होती है। गुरुदेव जी द्वारा निर्देशित मार्ग क़ा पालन करना ही हमारे जीवन क़ा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

जै माता की जै गुरुवर की

लेखक- शिवबहादुर सिंह फरीदाबाद (हरियाणा)

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