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5 खाड़ी देशों के दौरे पर निकले सऊदी क्राउन प्रिंस सलमान, अरब देशों के बीच दूरियां खत्म करने की कोशिश

रियाद एजेंसी। अमेरिका, इजराइल, यूरोप और खाड़ी देशों को ईरान के एटमी ताकत बनने का डर सता रहा है। शायद यही वजह है कि खाड़ी के सबसे ताकतवर देश सऊदी अरब के काउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अरब देशों को ईरान के खिलाफ एकजुट करने के मिशन पर निकल गए हैं। सलमान ओमान, UAE, बहरीन, कतर और कुवैत जा रहे हैं। पहले चरण में वो ओमान पहुंचेंगे। सलमान की यह विजिट इसलिए भी अहम हो जाती है, क्योंकि पश्चिमी देश ईरान से एटमी डील पर विचार कर रहे हैं। इजराइल और खाड़ी देश इस डील के खिलाफ पहले भी रहे हैं और अब भी हैं।

अचानक बढ़ी हलचल
खाड़ी और खासकर अरब देशों में पिछले दिनों अचानक डिप्लोमैटिक हलचल कुछ तेज होती नजर आ रही है। हाल ही में तुर्की के राष्ट्रपति रिसेप तैयप एर्दोगन ने कतर का दौरा किया था। इसके पहले यूएई के टॉप इंटेलिजेंस अफसरों ने ईरान का दौरा किया था। हालांकि, सऊदी अरब के कुछ अफसरों का कहना है कि अगले महीने गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल की बैठक होने वाली है और सलमान इसी सिलसिले में खाड़ी देशों के दौरे पर गए हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हालिया एक या दो साल में सऊदी अरब और UAE के बीच ट्रेड और फॉरेन पॉलिसी के मुद्दे पर मतभेद बढ़े हैं। बहरीन, कुवैत और कतर के मामले में भी यही कहा जात सकता है। सलमान खाड़ी देशों को एकजुट करना चाहते हैं।

हाल ही में फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों सऊदी अरब के दौरे पर थे। सऊदी डिफेंस सेक्टर में फ्रांस से सहयोग चाहता है।

खाड़ी देशों में मतभेद क्यों-
‘अल जजीरा’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें कोई दो राय नहीं कि अब भी मुस्लिम और खाड़ी देशों में सऊदी अरब जैसा प्रभावशाली देश दूसरा नहीं है और न ही उसके दबदबे को इस क्षेत्र में चैलेंज किया जा सकता। इसके बावजूद बहरीन, कतर और UAE कहीं न कहीं सऊदी के लिए चैलेंज पैदा कर रहे हैं। सलमान चाहते हैं कि ईरान सभी खाड़ी देशों के लिए बड़ा चैलेंज हैं, इसलिए कम से कम उसके मामले में खाड़ी देश एकजुट रहें। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि सऊदी और यूएई ने ईरान से सीधी बात भी की है।

अमेरिकी फैक्टर-
जो बाइडेन ने जनवरी में सत्ता संभाली थी। इसके बाद से यह साफ संकेत हैं कि वो खाड़ी देशों को वो तरजीह नहीं दे रहे हैं जो डोनाल्ड ट्रम्प दे रहे थे। शायद यही वजह है कि प्रिंस सलमान अपना घर दुरुस्त करने की कवायद में जुट गए हैं। अमेरिकी फॉरेन पॉलिसी में फिलहाल चीन और रूस का मुकाबला एजेंडे पर नजर आता है। माना जाता है कि बाइडेन ने अफगानिस्तान से फौज वापसी का फैसला लिया ही इसलिए ताकि वे चीन और रूस जैसी दो बड़ी चुनौतियों का सामना कर सकें।

हालात बदल रहे हैं-
यह सच है सऊदी अरब और UAE या पूरे अरब वर्ल्ड में अब भी अमेरिका ही सबसे बड़ा आर्म्स सप्लायर है। लेकिन, इसके बावजूद इस क्षेत्र के देश फ्रांस, रूस और चीन की तरफ हाथ बढ़ा रहे हैं। इसकी वजह यह है कि यह अपने देशों में डिफेंस इंडस्ट्रीज लगाना चाहते हैं।
यूएई, सऊदी अरब, बहरीन और इजराइल ने 2015 में अमेरिका और ईरान के बीच हुए न्यूक्लियर एग्रीमेंट का विरोध किया था। बाद में ट्रम्प ने खुद इस डील को रद्द कर दिया था।

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