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जीवन संरक्षण के लिए पर्यावरण संरक्षण का लें संकल्प, प्रकृति रक्षा हमारा नैतिक दायित्व

डेस्क न्यूज। क्षिति, जल, पावक, गगन,समीरा। पंच रचित अति अधम शरीरा।। अर्थात पृथ्वी, जल,आकाश,अग्नि और वायु.. इन पंच तत्वों से मिलकर शरीर बनता है। पर्यावरण अर्थात हमारे आसपास का वातावरण ही पर्यावरण है । इसमें भूमि,जल, वायु, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, जंगल, नदियां, पर्वत एवं अन्य प्राकृतिक संसाधन शामिल है । लगभग सभी चीजों की आपूर्ति हमें पर्यावरण से ही होती है । 5 जून को सभी लोग विश्व पर्यावरण दिवस मनाते हैं इस दिन कई आयोजन होते हैं, अपने शहर में भी अनेको लोगों व संस्थाओं ने वृक्षारोपण किया साथ ही शोसल मीडिया भी पर्यावरण दिवस के संदेशों से पटा पड़ा रहा लेकिन क्या केवल दिवस मनाकर हम पर्यावरण बचा लेंगे ? आइए विचार करते हैं

प्रकृति ने हम इंसानों को जीवन- यापन के लिए एक से बढ़कर एक संसाधन दिए, मगर विकास की अंधी दौड़ एवं अपने लालच व स्वार्थ के चलते इंसान प्रकृति का बेतहाशा दोहन कर रहा है, हम भविष्य की चिंता न करके वर्तमान के सुख की चाह में जल, जंगल, जमीन का नुकसान कर अपने ही हांथो अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं ।

देखा जाए तो मनुष्य इस पृथ्वी पर रहने वाला एकमात्र ऐसा जीव है जो की पृथ्वी के तमाम संसाधनों का बेतरतीब तरीके से दोहन करता है, एक वक्त ऐसा था जब इस पृथ्वी पर इंसान तो थे लेकिन वे एकदम सीमित संख्य़ा और स्थान पर निवास करते थे जिसके कारण पृथ्वी का समन्वय बना हुआ था परन्तु समय के साथ खेती की खोज हुयी और मनुष्यों ने एक स्थान पर रहना शुरू कर दिया और उद्योगों आदि की स्थापना की, विभिन्न धातुओं के खोज के साथ ही मनुष्य की महत्वाकांक्षा बढती चली गयी और मनुष्यों ने पृथ्वी का दोहन शुरू किया, इसी दोहन के कारण मौसम के कई परिवर्तन आये, पर्यावरणीय असंतुलन हुआ जिससे अनेको प्राकृतिक प्रकोप और बीमारियों को जन्म हुआ और इन्ही बीमारियों ने महामारी का रूप ले लिया। उद्योगीकरण और वैश्वीकरण ने खाद्य से लेकर जल तक को अशुद्ध कर दिया जिसने बीमारियों को निमंत्रण देने का कार्य किया ।

प्रकृति संरक्षण हमारी संस्कृति का अंग-


प्रकृति की आराधना तथा पर्यावरण का संरक्षण करना हमारा पुरातन भारतीय चिंतन है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना से युक्त जीवन व्यतीत करने वाले वैदिक ऋषियों ने प्राकृतिक शक्तियों-वसुंधरा, सूर्य, वायु, जल, बृक्षों आदि की भावपूर्ण स्तुति की है। सनातन संसृकृति में हमारे देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों, महापुरुषों के जीवन से हमें प्रकृति संरक्षण, जीव दया की अनेकों सीख मिलती है वहीं विद्वानों द्वारा विरचित वेदों, पुराणों, शास्त्रों उपनिषदों तथा अनेक धार्मिक ग्रंथों में पर्यावरण संरक्षण के उपदेश लिखे हैं। पर्यावरण और जीवन का संबंध सदियों पुराना है। इसलिए हमारी संस्कृति में प्रकृति की पूजा पुरातन काल से ही की जाती है, अनेकों उत्सवों व त्योहारों के अवसर पर पेड़-पौधों नदियों,जीव-जंतुओं, पर्वतों, सूर्य चंद्रमा आदि की पूजा अर्चना करने का विधान है जो कि प्रकृति या पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते है।

अथर्ववेद में सहस्त्रों वर्ष पूर्व से उद्घोषित है, ‘माता भूमिः पुत्रोSहं पृथिव्याः’अर्थात् वसुंधरा जननी है, हम सब उसके पुत्र हैं। विश्व में विद्यमान प्रत्येक प्राणी, प्रत्येक वनस्पति एवं प्रत्येक स्पंदनशील प्रजाति पर प्रकृति का बराबर स्नेह है। शायद यही प्रमुख कारण है कि वनों में निवास करने वाले वनवासी-आदिवासी लोगों का पर्यावरण के प्रति आदर व स्नेह सभ्यता की शुरुआत से रहा है। मनुष्य तथा उसके पर्यावरण दोनों परस्पर एक-दूसरे से इतने संबंधित हैं कि उन्हें अलग करना कठिन है। एक प्रकार से मनुष्य प्राकृतिक पर्यावरण का महत्वपूर्ण घटक है।

जीवन बचाना है तो प्रकृति सहेजें-


आवश्यकता है स्वयं जागरूक होते हुए समाज जागरण की। दिनों-दिन पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता जा रहा है जलस्तर कम होता जा रहा है, पेड़ों को काटा जा रहा है, जलस्रोत प्रदूषित और अतिक्रमण का शिकार हो रहे हैं। पर्यावरण और स्वच्छता के स्तर में गिरावट के पीछे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई सबसे अहम कारण है. धरती बेशुमार पेड़ों से आच्छादित है, लेकिन लोग अपनी सुविधा और फायदे के लिए इन्हें जमकर काट रहे हैं. आज हालत यह हो गई है कि जंगल खत्म होने से कई इलाके बंजर हो गए हैं।

जैसे-जैसे शहर विकसित हो रहे हैं, हरियाली कम और कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं। हर साल प्रदूषण के मामले में बढ़ोतरी हो रही है । यदि हम अभी से नहीं चेते तो आने वाले कुछ सालों में साफ हवा में सांस लेने के लिए सिर्फ पहाड़ और जंगल ही बचे रह जाएंगे। प्रदूषण लगातार हमारी सांसें कम कर रहा है। नए पैदा होने वाले कई बच्चों पर इसका असर भी दिख रहा है । विश्व पर्यावरण दिवस तब सार्थक सिद्ध होगा जब हम संकल्प लें पर्यावरण को संरक्षित करने का, जो आने वाली पीढ़ियों को साफ सुथरी हवा देने में मददगार हो सके।

लेखक- पं. सौरभ तिवारी छतरपुर (म.प्र)

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