Home शक्ति न्यूज़ खास भौतिक वस्तुओं के पीछे हम अपना सर्वस्व लगा रहे हैं, इस अंधी...

भौतिक वस्तुओं के पीछे हम अपना सर्वस्व लगा रहे हैं, इस अंधी दौड़ का हम लोग कब तक हिस्सा बने रहेंगे, क्या हमने कभी तनिक भी विचार किया कि जिन आध्यात्मिक क्रमों (माँ गुरूवर की साधना) के द्वारा सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, उन क्रमों में हम कितना समय देते हैं?

डेस्क न्यूज। वर्तमान समय मे अधिकतर लोग सुबह से शाम तक इसी उधेड़ बुन मे लगे रहते हैं की येन केन प्रकारेण भौतिक सुखों की प्राप्ति की जाए।पैसे कमाने के चक्कर मे अपने जीवन के महत्व पूर्ण कर्तव्यों से विमुख होते जा रहे हैं। कोरोना महामारी के दौरान अनगिनत लोगों की जाने चली गयीं, उन्हे या उनके परिवार को कुछ समझ मे नही आया।

आनन फानन मे लोगों के प्राण पखेरू हो गये। जीवन क्षण भंगुर है। इस बात का हम सभी को पता है। इसके बावजूद भी हम लोग आध्यात्म के बारे मे रुचि नही लेते हैं। जब हमें अच्छी तरह से पता है की हमारे साथ समस्त भौतिक वस्तुएं नही जाएँगी अगर साथ जाएगा तो हमारे सत्कर्म ।तब भी हम लोग हर समय तीन पांच मे लिप्त रहते हैं। मैने स्वयं देखा है की कई ऐसे परिवार हैं जिनके ज्यादातर सदस्यों को कोरोना हो गया था और कुछ लोग तो बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचा पाए हैं, उसके बावजूद भी ठीक होने के बाद ही बुरी तरह से माँस खाने मे फिर से लिप्त हो गये। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन मे घटने वाली दुर्घटनाओं से सीख लेनी चाहिए कि भविष्य मे हम कोई भी गलती नही करेंगे।

जानबूझ कर बहुत सारे लोग गलतियाँ करते रहते हैं। प्रकृति बार-बार अनेक माध्यमों से हमें सचेत करती है पर हम लोग बार बार अनसुना कर देते हैं। हम लोग प्रकृति की चेतावनी को पकड़ इसलिए नही पाते हैं की हमारे आत्मा पर कुसँस्कारो की कालिख लगी हुई है। बिना साधना के ये कालिख मिट ही नही सकती है। कई अज्ञानी आत्मा के महत्व को स्वीकार करते ही नही जबकि हमारे पूरे जीवन को जो संचालित करती है वो हमारे अंदर माँ का अंश आत्मा के रूप में ही विराजमान है। जब हम लोग आत्मावानों का जीवन जीने लगेंगे तो हमें जीवन के सारे रहस्यों की जानकारी होने लगेगी।लोग आज भी भ्रष्टाचार में बुरी तरह से लिप्त हैं।

दिन के उजाले में ही अपने काले कारनामों को अन्जाम दे रहे हैं।अपने जीविकोपार्जन के लिए जो भी जरूरी कार्य हो उसे अवश्य करना चाहिए। उसके बाद शेष समय माँ गुरूवर की साधना में जरूर व्यतीत कीजिए। जब पानी एक निश्चित तापमान पर ही खौलता है तो कोई भी सत्कार्य निश्चित समय सीमा के बाद ही अपना प्रतिफल देगा। हम सबका प्रमुख कर्तव्य है की प्रतिदिन गुरुदेव श्री शक्ति पुत्र महाराज जी द्वारा निर्देशित मार्ग का पालन करें।जब हम साधना नही करते हैं तो जीवन के बहुत सारे सत्य से अनभिज्ञ रहते हैं।

जैसे-जैसे हमारी साधना बलवती होती जाती है, हमारा विवेक जागृत होने लगता है और हमें सत्य असत्य का बोध होने लगता है।सत्य के जीवन को ही जीवन की सार्थकता कहा जाएगा अन्यथा हमारा जीवन पशुओं के समान ही है की खाया, पीया, सोया, वासनात्मक जीवन जिया और एक दिन इस दुनिया से चले गये। गुरुदेव जी के अदभुत चिंतनों को श्रवण करके अपने जीवन में अमल करना ही हमारा आपका प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।

जै माता की जै गुरुवर की

लेखक- शिवबहादुर सिंह फरीदाबाद (हरियाणा)

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