Home शक्ति न्यूज़ खास रिश्तों की सच्चाई का असली पता तो कोरोना काल में ही चल...

रिश्तों की सच्चाई का असली पता तो कोरोना काल में ही चल पाया, रिश्ते- नाते सब जीवन के भटकाव हैं, रिश्ता कायम करना ही है तो माँ-गुरूवर जी से कीजिए, जिसका प्रतिफल जन्मों-जन्मों तक प्राप्त होता रहेगा

डेस्क न्यूज। रिश्तों की असलियत पहली बार सबको पता चल गयी कि माँ-बाप, भाई-बहन और पति-पत्नी के रिश्ते सिर्फ एक भुलावा हैं।जब व्यक्ति मौत से संघर्ष कर रहा था तो वहाँ वो बिल्कुल अकेला था। सभी लोग गलतफहमी के शिकार होकर जीवन यापन करते हैं। इस समय की परिस्थिति में सबकी आँखें खुल गयी।कई लोगों के परिवार के सदस्यों की मृत्यु की सूचना मिली तो मृतक के अंतिम सँस्कार में परिवार का कोई भी सदस्य सम्मिलित नही हो सका।

कई लोग परिवार के सदस्य क़ो लेकर अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे पर बेड नही मिल पाया। कई लोगों की मृत्यु आक्सीजन के अभाव में हो गयी। ऐसी अजीब स्थिति कभी भी देखने क़ो नही मिली की अस्पताल में अपना ही सदस्य भर्ती है और हम लोग उसके पास नही जा पा रहे थे। मेरे कहने का तात्पर्य ये नही है कि रिश्ते नाते छोड़ देना चाहिए, बल्कि ये होना चाहिए कि इन रिश्तों में अत्यधिक लिप्तता ठीक नही है। सामान्य रहना चाहिए और रिश्तों के पीछे इतना पागल नही होना चाहिए कि हम अपने मूल कर्तव्यों क़ो ही भूल जाएँ।इस विपत्ति काल मे कई लोग तरह-तरह के गोरख धंधों मे भी लिप्त रहे और लोगों को लूटने खसोटने का भी कार्य करते रहे। मृतक के परिवार वालों को तरह- तरह से परेशान किया गया।जीवन का मूल उद्देश्य माँ जगत जननी की आराधना और साधना ही होना चाहिए।

देखिए हानि-लाभ, जीवन-मरन, यश-अपयश सब माँ दुर्गा जी के हाँथ मे है ,पर हम लोग अपने कार्यों को सुव्यवस्थित ढंग से करें। अभी भी वक्त है कि हम लोग समझ जाएँ कि हम बुरे कार्यों से दूर हो जाएँ। नशे के सेवन से ख़ुद बचें और दूसरों को भी समझायें। माँस का सेवन बन्द कर दें। घर मे शान्ति का वातावरण सदैव कायम रखिए।ये बात सदैव ध्यान रखना होगा कि हम आत्मा पर पड़े हुए आवरण को हटाने का निरन्तर प्रयास करते रहें। माँ गुरूवर जी की नियमित साधनाओं द्वारा हम विकार मुक्त होने लगेंगे। समस्त समस्याओं का समाधान इसी साधना के माध्यम से ही प्राप्त होगा।

कई लोग परिवार के खातिर घूस वगैरह लेते हैं, ये गलत है। इनको अपने परिवार से पूछना चाहिए की जब हमको इसकी सजा मिलेगी तो कौन कौन हमारे साथ जेल चलेगा। साथ कोई भी नही जाएगा। जब हमें अकेले ही सजा भुगतना है तो हम गलत कार्य क्यूँ करें। परोपकार करने की भावना हर समय रखनी चाहिए। जो लोग भी आपसे जुड़े हैं उनको दुःखी ना करें। आज अगर हम सजग होकर कार्य नही करेंगे तो आगे का समय और भी कठिन होगा।सारे जीवन को भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए झोंक देना ठीक नही है। थोड़ा समय आत्मा की शुद्धता के लिए भी निकालना चाहिए। मनुष्यों को खुश करने से लाख बेहतर है की हम लोग माँ गुरूवर को खुश करें, जिससे हमारे कई जन्म संवर जाएँगे।

जै माता की जै गुरूवर की

लेखक- शिवबहादुर सिंह फरीदाबाद (हरियाणा)

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