हर समस्या का समाधान हैं प्रभु श्री राम और भक्त हनुमान का नाम

@आध्यात्मिक। माना जाता है कि बजरंग बाण की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की थी। जनश्रुतियों के अनुसार, जब तुलसीदास जी को गंभीर शारीरिक कष्ट (कहा जाता है कि उनके हाथ में असहनीय पीड़ा थी जिसे ‘बाहु पीड़ा’ कहा गया) हुआ या जब उन पर किसी तांत्रिक शक्ति का प्रभाव हुआ, तब उन्होंने हनुमान जी की उग्र स्तुति के रूप में ‘बजरंग बाण’ की रचना की।

यहाँ ‘बाण’ का अर्थ धनुष से निकलने वाला तीर है। जिस प्रकार एक बार धनुष से छूटा हुआ बाण अपने लक्ष्य को भेद कर ही दम लेता है, उसी प्रकार इस पाठ को करने से हनुमान जी की कृपा अचूक रूप से प्राप्त होती है। इसमें भक्त हनुमान जी को उनके ‘राम की शपथ’ दिलाता है, जिससे वे भक्त की सहायता के लिए तुरंत विवश हो जाते हैं।
इस स्तुति में हनुमान जी के उस स्वरूप का वर्णन है जो दुष्टों का संहार करता है। इसकी मुख्य कड़ी है:
“इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की।”
अर्थात, भक्त कहता है कि हे हनुमान जी! यदि आप मेरी रक्षा नहीं करेंगे और इन संकटों का नाश नहीं करेंगे, तो आपको आपके आराध्य श्री राम की सौगंध है। यह एक अत्यंत प्रभावशाली और उग्र आह्वान माना जाता है।
बजरंग बाण के पाठ के साथ एक गंभीर चेतावनी भी जुड़ी होती है। विद्वानों का मानना है कि इसे रोज सामान्य पूजा की तरह नहीं करना चाहिए क्योंकि:
इसमें बार-बार हनुमान जी को श्री राम की शपथ दी जाती है। बिना किसी बड़े संकट या शत्रु बाधा के भगवान को शपथ दिलाना उचित नहीं माना जाता। इसका उपयोग केवल तभी करना चाहिए जब व्यक्ति अत्यंत संकट में हो और अन्य सभी मार्ग बंद हो चुके हों।
बजरंग बाण का मूल उद्देश्य शत्रु बाधा, तंत्र-मंत्र का प्रभाव, गंभीर रोग और अज्ञात भय से मुक्ति पाना है। यह हनुमान चालीसा से अधिक उग्र और शक्तिशाली माना जाता है क्योंकि इसमें हनुमान जी के प्रति भक्त का एक “हठ” दिखाई देता है।




