आध्यात्मिक

ईश्वर एक हैं: शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं, किसी दूसरे की श्रद्धा का अपमान करना ही सबसे बड़ी अधार्मिकता

@आध्यात्मिक। एक गाँव में दो मंदिर आमने-सामने थे। एक ओर लक्ष्मीनारायण का भव्य मंदिर था, तो दूसरी ओर भगवान शिव का शिवालय था। इन दोनों मंदिरों के बाहर एक बूढ़ी अम्मा बैठी रहती थी जो फूल बेचकर अपना गुज़ारा करती थी। गाँव के सभी भक्त उन्हीं से फूल लेकर पूजा करने जाते थे। एक दिन फूलों की आवक कम हुई और वृद्धा के पास फूल कम पड़ गए। तभी वहां एक कट्टर शिवभक्त आया और महादेव की पूजा के लिए फूल मांगने लगा।

अहंकार की शुरुआत
वृद्धा ने हाथ जोड़कर कहा, “बेटा, मेरे पास अब फूल खत्म हो गए हैं। जो थोड़े-बहुत बचे हैं, उन्हें सामने वाले लक्ष्मीनारायण मंदिर के एक भक्त ने पहले ही मंगवा लिया है, वह आता ही होगा।” यह सुनकर वह शिवभक्त क्रोधित हो गया। उसने अहंकार में भरकर कहा, “तू उन विष्णु के भक्त के लिए फूल बचा रही है? क्या तुझे नहीं पता कि मेरे महादेव ही सर्वोपरि हैं? उन पत्थरों के नारायण को फूलों की क्या आवश्यकता! तू वो फूल मुझे दे, मुझे अपने प्रभु को प्रसन्न करना है।” वृद्धा के बार-बार मना करने के बावजूद, उस भक्त ने ज़बरदस्ती फूलों की टोकरी छीन ली और तेज़ कदमों से शिव मंदिर की ओर चल दिया।

शिवलिंग में नारायण के दर्शन
जैसे ही वह गर्व के साथ शिवलिंग पर फूल अर्पित करने लगा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे साक्षात शिवलिंग के भीतर भगवान विष्णु (नारायण) के दर्शन हुए। वह जिसे भी फूल चढ़ाता, वह महादेव के बजाय शिवलिंग में समाए हुए नारायण के चरणों में गिर जाते।
तभी उसे एक गंभीर और दिव्य वाणी सुनाई दी: “हे अज्ञानी! तू जिसे मेरा अपमान समझकर छीन लाया, वह मेरा ही स्वरूप है। जो हरि (विष्णु) और हर (शिव) में अंतर समझता है, उसकी पूजा मैं कभी स्वीकार नहीं करता। नारायण मेरे हृदय में बसते हैं और मैं उनके हृदय में।”
पश्चाताप और ज्ञान
शिवभक्त का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया। उसे समझ आ गया कि ईश्वर एक है, बस उनके रूप अलग हैं। उसने तुरंत भागकर उस वृद्धा से और लक्ष्मीनारायण के उस भक्त से क्षमा मांगी।
ईश्वर एक है: शिव और विष्णु में कोई भेद नहीं है।
अहंकार भक्ति का शत्रु है: यदि मन में द्वेष या अहंकार है, तो भगवान कभी आपकी पूजा स्वीकार नहीं करते।
सम्मान: किसी दूसरे की श्रद्धा का अपमान करना ही सबसे बड़ी अधार्मिकता है।

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