कटनी

इतिहास से वर्त्तमान तक जिसने विजयराघवगढ़ विधानसभा की लिखी कहानी, इतिहास संस्कार और सेवा, विजयराघवगढ़ की आत्मा का नाम है पाठक परिवार, जहाँ प्रेम सेवा और विश्वास का गठबंधन हो, वहाँ साज़िशों की दाल कभी नहीं गलती

@कटनी-शेरा मिश्रा। विजयराघवगढ़ विधानसभा केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है यह संस्कार सेवा और समर्पण की जीवित परंपरा है। और इस परंपरा को अगर किसी एक परिवार ने पीढ़ी दर पीढ़ी अपने आचरण से गढ़ा है तो वह है पाठक परिवार। इतिहास से वर्तमान तक विजयराघवगढ़ की मिट्टी में विकास भरोसे और अपनत्व के जो बीज बोए गए हैं उनमें पं. सत्येंद्र पाठक बाबू जी और उनके पुत्र संजय सत्येंद्र पाठक की साधना स्पष्ट दिखाई देती है। पं. सत्येंद्र पाठक बाबू जी केवल विधायक या मंत्री नहीं थे वे एक युग थे। एक ऐसा युग जिसकी चर्चा आज भी कांग्रेस और भाजपा दोनों दल सम्मान के साथ करते हैं। उनके कार्य किसी पार्टी की सीमाओं में नहीं बंधे थे बल्कि मानवता संवेदना और कर्तव्य की परिधि में थे।

आज भी विजयराघवगढ़ में अनगिनत घर ऐसे हैं जहाँ का चिराग बाबू जी की वजह से बुझने से बचा। वे राजनीति नहीं करते थे वे पीड़ा को पहचानते थे। अपने अंतिम समय में जब बाबू जी ने विजयराघवगढ़ की जिम्मेदारी अपने पुत्र संजय सत्येंद्र पाठक को सौंपी तो यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं था यह संस्कारों की विरासत थी। और संजय सत्येंद्र पाठक ने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल उत्तराधिकारी नहीं बल्कि उत्तरदायित्व के सच्चे वाहक हैं। संजय सत्येंद्र पाठक कहते हैं विजयराघवगढ़ मेरा परिवार है। और क्षेत्रवासी कहते हैं वे कहते नहीं निभाते हैं। जरूरत के समय वे किसी अदृश्य शक्ति की तरह सामने आते हैं। बिना शोर बिना प्रचार बिना शर्त मदद करते है।

शायद ही कोई अनुमान लगा पाएगा कि संजय सत्येंद्र पाठक हर महीने कितनी बड़ी राशि केवल मानवता की रक्षा मरीजों के इलाज में खर्च कर देते हैं इतनी कि कई बार एक वरिष्ठ अधिकारी के कई महीनों के वेतन से भी अधिक खर्च करते है । बेटी की शादी हो खिलाड़ी के खेल सामग्री हो छात्रों का भविष्य हो या किसी गरीब का इलाज संजय पाठक वहाँ मिलते हैं जहाँ व्यवस्था अक्सर चुप होती है। उनका दरबार कोई चमत्कार का मंच नहीं है बल्कि अपनत्व की चौखट है। लोग वहाँ इसलिए नहीं जाते कि कुछ माँगना है बल्कि इसलिए जाते हैं क्योंकि उन्हें पता है यहाँ से कोई खाली नहीं लौटता।

कहते हैं वे अमीर हैं लेकिन वे कभी अमीरी ओढ़ते नहीं।कुर्सी मिले तो भी सहज ज़मीन पर बैठना पड़े तो भी सहज।जिनके पास सलाहकारों की कमी नहीं, वे भी यह मानते हैं कि ज्ञान कभी-कभी सबसे छोटे से भी मिल जाता है। खतरों से नहीं डरते क्योंकि जब अपनों पर संकट आता है तब न रास्ता देखते हैं न तूफान। अकेले दौड़ पड़ते हैं और किसी बुझते घर का दिपक रोशन कर देते हैं। जीवन में उन्होंने कईयों को उठाया संवारा सम्मान दिया जमी से उठा कर आसमान पर बिठाया किन्तु कुछ लोगों ने उसी हाथ को डसने की कोशिश भी की जिसने उन्हें थामा था।लेकिन संजय का साम्राज्य ईंटों से नहीं, विश्वास से बना है और विश्वास कुछ गिने चुने धोखों से नहीं टूटता।

पुत्र के रूप में वे श्रवणमित्र के लिए सुदामा गरीबों के लिए लक्ष्मीपुत्र और क्षेत्र के लिए महादेव हैं जो स्वयं विष पीकर दूसरों को अमृत बाँट देते हैं। यही कारण है कि विजयराघवगढ़ का हर नागरिक पाठक परिवार के साथ खड़ा है। यह संबंध राजनीति का नहींरिश्ते का है।और विपक्ष यह बात जितनी जल्दी समझ ले उतना अच्छा क्योंकि जहाँ प्रेम सेवा और विश्वास का गठबंधन हो वहाँ साज़िशों की दाल कभी नहीं गलती।


शेरा मिश्रा पत्रकार विजयराघवगढ़ कटनी

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