आध्यात्मिक

यदि हम विश्वामित्र, वशिष्ठ जैसे ऋषियों की आराधना कर रहे होते, उनके ज्ञान कों फैला रहे होते, तो आज समाज का इतना पतन न होता: शक्तिपुत्र जी महाराज

@आध्यात्मिक। हमारी भारतीय संस्कृति-सभ्यता में बहुत कुछ हैं, जो विश्व में कहीं पर भी नहीं हैं। हम अपने आप पर गर्व करें,  अपनी भारतीयता पर गर्व करें, अपनी मर्यादायों पर गर्व करें, अपने देवी-देवताओं पर गर्व करें। यदि हम  यें कार्य कर रहे होते, तो हमारे तथाकथित शंकराचार्य कों कोई साईं का भय न सताता। एक साईं के पूजन में भक्तों के बढ़ते हुए समूह नें शकराचायों के आसन कों डगमगा दिया, उन्हें लगा कि पूरा हिन्दू समाज उधर जा रहा हैं, हमारे मठों में चढ़ावा बंद हो रहा हैं और वहां अरबों की संपत्ति चढ़ाई जा रही! याद होगा, मैंने आज से पांच-सात साल पहले कहा था कि गौरवान्वित महसूस करता हूं कि कम से कम एक साधक, एक ऋषि का पूजन करने के लिए समाज आगे बढ़ने तो लगा। यह अलग बात हैं कि वहां केवल धनाढय ही जा रहे हैं, पैसों का अंबार चढ़ाते जा रहे हैं। यदि वे साईं की उस विचारधारा कों अपनाते कि वे किस तरह मानवता की सेवा में समर्पित थे, तो वे साईं के दर्शन करने जरूर जाते, मगर अपने करोड़ों रूपये वहां चढ़ाने के बजाय किसी गांव में जाकर गरीबों का कल्याण कर रहे होते।

गुरुवर नें कहाँ कि यदि हम विश्वामित्र, वशिष्ठ जैसे ऋषियों की आराधना कर रहे होते, उनके ज्ञान कों फैला रहे होते, तो आज समाज का इतना पतन न होता। मैं शंकराचार्य से पूछना चाहता हूं कि आप धर्म प्रमुख, धर्म के ठेकेदार माने जाते हैं और हमारे धर्म में क्या कुछ नहीं भरा हुआ है एक से एक दिव्य मंदिर हैं, एक से एक दिव्य दिव्य देवस्थान है, ऐतिहासिक स्थान है, हमारी धरोहर हैं, उनके सम्मान को बढ़ाने के लिए क्या किया गया? न आप देवस्थानों की रक्षा कर सके, न उनके सम्मान को बढ़ा सके और न उनसे जुड़ने वाली गरीब जनता को स्वीकार कर सके! आज भी हमारे शंकराचार्य छुआछूत मानते हैं, आज भी वह किसी हरिजन का बनाया हुआ भोजन नहीं कर सकतें, आज भी गरीब जनता उनके नजदीक नहीं जा सकती। उनको तो धनाढ़य, करोड़पति, अरबपति प्रिय हैं। सबकुछ ऐसे भटक रहा है कि आज आवाज न उठाई गई तो समाज का पतन इसी प्रकार होता चला जाएगा। अतः तुम्हें जागना है, तुम्हें कर्मवान् बनना है। तुम अपने आपको सुधार लो और अपने घर पर सच्चे मन से उस परमसत्ता माता आदिशक्ति जगत् जननी जगदंबा की साधना- आराधना करो। कुछ नहीं कर सकते हो तो “मां और ॐ” का उच्चारण करो और कुछ कर सकते हो, तो प्रतिदिन श्री दुर्गा चालीसा पाठ करो।

गुरुवर नें कहाँ कि मेरे पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में श्री अखंड दुर्गा चालीसा पाठ चौबीसों घंटे अनवरत अनंतकाल के लिए चल रहा है। अतः निष्ठा- विश्वास सी “मां” की आराधना करो, स्तुति करो। “माँ” ही तुम्हें इस कलिकाल से निकल सकती हैं। अरे, जब देवाधिदेव भी असमर्थ हो जाते हैं, तब वह परमसत्ता अवतार लेकर उनके संकटों को दूर करती है, तो हमारी मानवता के संकटों को भी वही परमसत्ता दूर करेगी, हमें सिर्फ सच्चे मन से उस परमसत्ता को पुकारने की जरूरत है। उसको पुकारने के लिए मन और हृदय कों सच्चा बना लेने की जरूरत है। परमसत्ता हमारे हृदय में वास करेगी और हम जो ठानेंगे वह कर गुजरेंगे। तुम्हें वैसी सोच बनाने की जरुरत हैं।

गुरुवर कहते हैं नित्य अपने घर में श्री अखंड दुर्गाचालीसा का अवश्य करो। जब समय मिलता है, तो उसे पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम में आकर से दुर्गाचालीसा का पाठ करो। गुरुवार का व्रत रखो घर में “माँ” का ध्वज फहराकर रखो। बच्चों को नशे- मांस से मुक्त कराकर संस्कारवान् बनाओ, फिर देखोसमाज में कैसे परिवर्तन आता है। मेरे द्वारा प्रत्येक कार्यकर्ता को बार-बार कहा जाता है कि कभी भी अहंकार न आए, कभी तुम स्वार्थी मत बन जाना, तुम प्रमुख कार्यकर्ता हो इसलिए भविष्य में जो आने वाली कड़ियां हैं उनको कभी छोटा समझने की गलती मत कर देना। चूकि आज का भी यही आकलन करना चाहे, तो प्रमुख कार्यकर्ताओं से कहता हूं कि वह पीढ़ी आना प्रारंभ हो चुकी है, जिसके पास समाज में बहुत कुछ बदल डालने की क्षमता भरी हुई है।  दों से लेकर दस साल तक के बच्चों में जो समर्पण, निष्ठा, विश्वास मेरे नेत्र देखते हैं, जो उनका मेरे प्रति आकर्षण है, जो विचार व भविष्य की मैं देख रहा हूं, वह हजारों गुना ज्यादा तुमसे आगे खड़े नजर आएंगे। अतः कार्यकर्ता भी आपस में छोटे- बड़े का भाव भूल जाए पांच साल का बच्चा भी आपसे ज्यादा श्रेष्ठ हो सकता है, उसकी आत्मा आपसे ज्यादा चेतनावान् हो सकती है। अतः समता का भाव रखो, सबको एकसाथ लेकर चलने का भाव रखो, हर एक का कल्याण हो वह भाव अपने अंदर लेकर चलो, यही तुम्हारी “माँ” के प्रति सच्ची भक्ति हैं।

(संकलनकर्ता- आशुतोष द्विवेदी संपादक शक्ति न्यूज)

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