आध्यात्मिक

भगवान को छप्पन भोग या सोने के मुकुट से कहीं अधिक प्रिय अपने भक्त का भोलापन और शुद्ध प्रेम है

@आध्यात्मिक। ब्रज की पावन भूमि पर एक बहुत बड़े संत और विद्वान हुए, जिन्हें सभी व्यास जी (श्री हरिराम व्यास) के नाम से जानते थे। व्यास जी राधा-कृष्ण के अनन्य भक्त थे और शास्त्रों के इतने बड़े ज्ञाता थे कि बड़े-बड़े विद्वान उनसे शास्त्रार्थ करने से कतराते थे। वह नियम, मर्यादा और विधि-विधान के पक्के थे।

एक दिन व्यास जी ठाकुर जी का श्रृंगार कर रहे थे। उन्होंने प्रभु को सुंदर पीतांबर पहनाया, आभूषण सजाए और अंत में बारी आई ‘पाग’ (पगड़ी) बांधने की। व्यास जी ने रेशमी कपड़ा लिया और बहुत ही करीने से, शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार ठाकुर जी के सिर पर पगड़ी बांधने लगे।
लेकिन एक विचित्र घटना घटी। व्यास जी जैसे ही पगड़ी का आखिरी सिरा फंसाते, पगड़ी अपने आप ढीली होकर गिर जाती। उन्होंने दूसरी बार प्रयास किया, तीसरी बार प्रयास किया… देखते-ही-देखते घंटों बीत गए। व्यास जी को पसीना आने लगा। उन्हें लगा कि शायद कपड़ा ठीक नहीं है, या उनके हाथों से कोई अशुद्धि हो गई है। उन्होंने नया कपड़ा लिया, गंगाजल से हाथ धोए, लेकिन परिणाम वही— ठाकुर जी के सिर पर पगड़ी टिक ही नहीं रही थी।

व्यास जी व्याकुल होकर रोने लगे। उन्होंने ठाकुर जी के सामने सर पटक दिया और बोले, “हे गोविंद! मुझसे क्या अपराध हुआ? क्या मेरी सेवा में अब प्रेम नहीं रहा? या आप मुझ पर क्रोधित हैं?”
तभी व्यास जी को एक आंतरिक अनुभव हुआ (कुछ संतों के अनुसार मंदिर में एक अदृश्य आवाज गूँजी)। ठाकुर जी ने कहा:
“व्यास जी, आपकी पगड़ी में ‘शास्त्र’ तो बहुत है, पर वह ‘अल्हड़पन’ नहीं है। आप मुझे ‘ईश्वर’ मानकर डर-डर के पगड़ी बांध रहे हैं, पर मुझे तो वह चाहिए जो मुझे अपना ‘सखा’ या ‘बालक’ मानकर लाड लड़ाए। बाहर मंदिर की सीढ़ियों पर मेरा एक ‘ग्वाला’ भक्त बैठा है, मैं आज अपनी पगड़ी सिर्फ उसी से बंधवाऊंगा।”

व्यास जी तुरंत मंदिर के बाहर दौड़े। वहां उन्होंने देखा कि एक साधारण सा ग्वाला, फटे-पुराने कपड़े पहने, एक कोने में बैठकर सुबक रहा था। वह नीची जाति का समझा जाता था, इसलिए उसे मंदिर के भीतर आने का साहस नहीं था।
व्यास जी ने उसके चरण पकड़ लिए। ग्वाला घबरा गया— “महाराज! आप तो इतने बड़े पंडित हैं, आप मेरे पैर क्यों छू रहे हैं?”
व्यास जी बोले— “भाई, आज मेरी सारी विद्वत्ता धरी की धरी रह गई। ठाकुर जी तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। चलो, आज उनकी पगड़ी तुम्हीं बांधोगे।”

वह ग्वाला कांपते कदमों से गर्भगृह में पहुँचा। उसे न मंत्र आते थे, न विधि पता थी। उसने बस अपने गमछे को उठाया और जैसे एक मित्र दूसरे मित्र के सिर पर लापरवाही और लाड से पगड़ी बांधता है, वैसे ही उसने ठाकुर जी के सिर पर लपेट दिया।
आश्चर्य की बात यह थी कि वह पगड़ी न केवल टिक गई, बल्कि इतनी सुंदर लगी कि व्यास जी देखते रह गए। ठाकुर जी के चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी जो व्यास जी ने पहले कभी नहीं देखी थी।

व्यास जी समझ गए कि भगवान को ‘पांडित्य’ से नहीं, बल्कि ‘प्रीति’  से जीता जा सकता है। उन्होंने उस दिन से अपनी सारी पोथियां किनारे रख दीं और ठाकुर जी के चरणों में बस ‘प्रेम’ की शरण ले ली।

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