भविष्य की आहट/ जोहान्सबर्ग सम्मेलन में मिला अमेरिका को करारा जवाब: डा. रवीन्द्र अरजरिया

डेस्क न्यूज। संसार में बदलाव की बयार के आसार दिखने लगे हैं। जोहान्सबर्ग में संपन्न हुए जी20 के शिखर सम्मेलन ने विस्तारवाद, वर्चस्ववाद, शक्तिवाद, आतंकवाद, षडयंत्रवाद जैसे नकारात्मक पक्षों पर पूर्णविराम लगाने की पहल का पहला पत्थर गाड दिया है। अमेरिका की नाराजगी के बाद भी उपस्थित सदस्य देशों ने एकमत से शान्ति, सुरक्षा और समृद्धि के नये सोपान स्थापित की कार्ययोजना को स्वीकृति देकर दुनिया के कथित ठेकेदारों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। परमाणु हथियारों की धमकी, आर्थिक सम्पन्नता का दम्भ और कूटनैतिक चालों से विकासशील देशों को गुलाम बनाने वाले राष्ट्रों को अब सहयोगी बनकर धरातल पर काम करना पडेगा।

खनिज संपदा, प्राकृतिक संसाधनों तथा प्रतिभाओं के उपयोग करने हेतु स्थलीय संरचनाओं की स्थापनायें अनिवार्य हो गई है। दूसरों की उपलब्धियों पर स्वयं का नाम लिखने वाले सकते में हैं। भारत ने विश्व के सामने विकास का नया खाका खींचा है। सम्मेलन में मिलकर काम करने, दूसरों की प्रगति में भागीदारी दर्ज करने तथा शान्ति की स्थापना हेतु प्रयास करने जैसे अनेक कारकों पर एकराय स्थापित होते ही कुटिल राष्ट्रों के माथे की लकीरें गहरा गईं हैं। जी 20 के भारत में हुए सम्मेलन में रचनात्मकता, सकारात्मकता और सहयोगात्मकता के सिद्धान्तों की स्थापित कर दी गई थी। दूरगामी नीतियों के तहत अफ्रीकन यूनियन को सदस्यता प्रदान की गई थी। उस सम्मेलन को अप्रत्यक्ष रूप से भविष्य की संभावनाओं के वास्तविक क्रियान्वय की आधार शिला कहना अतिशयोक्ति न होगा। उस बीजारोपण के बाद जोहान्सबर्ग में पौधे की कोपलें दिखाई देने लगीं।
भारत की ओर से इस सम्मेलन में जी 20 ग्लोबल ट्रेडिशनल नॉलेज रिपॉजिटरी, अफ्रीका स्किल्स मल्टीप्लायर, ग्लोबल हेल्थकेयर रिस्पॉन्स टीम, विकासशील राष्ट्रों हेतु सैटेलाइट-डेटा पार्टनरशिप, क्रिटिकल मिनरल्स सर्कुलरिटी इनिशिएटिव तथा ड्रग-टेरर नेक्सस का मुकाबला करने की जैसी योजनाओं पर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। इसी दौरान खुलासा हुआ कि अफ्रीका में भ्रष्टाचार, कर चोरी तथा अवैध व्यापार जैसे असंवैधानिक ढंग से कमाये गये लगभग 88 अरब अमेरिकन डॉलर विदेश भेजे जाते हैं। अफ्रीका से बाहर जाने वाले इन अवैध पैसों को खुली लूट के रूप निरूपित किया गया। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण सामने आये। दूसरों को कुचलकर आगे बढने वाले षडयंत्रकारी देशों द्वारा दी जाने वाली परमाणु हमलों की धमकी, आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा, हथियारों का प्रदर्शन, कुटिल चालों की व्यवहारिक परिणति, डीप स्टेट जैसे घातक समूहों का विश्वव्यापी जाल, आतंक का विस्तार जैसे कृत्यों की खुलकर निंदा की गई।
वैदिक ग्रन्थ महोपनिषद् में प्रकाशित श्लोक “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्” के अर्थों को जोहान्सबर्ग के मंच से कार्य रूप में परिणत किया गया। समूचे संसार को एक परिवार के रूप में स्थापित करते हुए सामूहिक कल्याण की अतीतकालीन सनातनी परम्परा को स्वीकार किया गया। बृहदारण्यक उपनिषद और तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्” का सदियों पहले निरूपण कर दिया गया था। अमेरिका की मुखिया की गैर मौजूदगी पर दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने कहा कि सभी देशों का अंतिम बयान पर सहमत होना बेहद जरूरी था, भले ही इसमें अमेरिका शामिल नहीं हुआ।
ट्रंप के लिए यह शिखर सम्मेलन बेहद कष्टप्रद रहा। उनका बडबोलापन, शेखचिल्ली वाला ख्वाब और दुनिया की बादशाहत हासिल का सपना चूर-चूर हो गया। दबाव वाली राजनीति करने, डर दिखाने वाली प्रवृति अपनाने और तानाशाही की मंशा रखने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति को पहली बार दुनिया ने उपेक्षित कर नई नीतियों का निर्धारण किया है। सूत्रों की मानें तो खुफिया तंत्र ने ह्वाइट हाउस को भारत के प्रभाव में होने वाले जोहान्सबर्ग सम्मेलन की संभावनाओं से पूर्व में ही अवगत करा दिया था। परिणामस्वरूप ट्रंप को न तो मोदी का सामने करने का साहस हुआ और न ही सम्मेलन के अन्य सदस्य देशों के सामने डींगें हांकने की हिम्मत। इस जोहान्सबर्ग सम्मेलन को एक मील का पत्थर माना जा रहा है जहां वैश्विक सुख, शान्ति और समृद्धि की नई योजनाओं की सामूहिक घोषणायें हुईं हैं।
इस आयोजन में साहूकारी करने, हथियारों के रास्ते खूनी कमाई करने और सरलता पर कुटिलता से वर्चस्व कायम करने वाले देशों का आइना दिखा दिया गया है। ऐसे में विश्वप्रगति हेतु भारत की केन्द्रीय भूमिका के औचित्य की प्रमाणिकता ने सनातन के सिद्धान्तों को एक मात्र कल्याणकारी मार्ग-पथ के रूप में पुनः स्थापित कर दिया है। इस माध्यम से भारत में विरोधी स्वरों की मनगढन्त चीखों को स्वतः ही जवाब मिल गया। मोदी को ट्रंप से डरने वाली, अमेरिका के सामने घुटने टेकने वाली तथा विदेश नीति में असफल रहने वाली जैसी दी जाने वाली विपक्षी उपाधियां अपने आप नस्तनाबूद हो गईं। देश-दुनिया में आज जी-20 शिखर सम्मेलन में अमेरिका को मिले करारे जवाब, भारत की नीतिगत विजय और विश्वशान्ति के नये मसौदे की जमकर चर्चा हो रही है। इस पथ पर देश को निरंतर बढाने हेतु नागरिकों का सामूहिक समर्थन नितांत आवश्यक है। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।
















