पिता के सपनों की राह पर चलता पुत्र: जनसेवा को धर्म मानने वाले संजय सत्येंद्र पाठक

कुछ व्यक्तित्व इतिहास नहीं लिखते वे परंपरा बन जाते हैं। कुछ पिता केवल संतान नहीं गढ़ते वे संस्कार और विचारधारा सौंपते हैं
@कटनी- शेरा मिश्रा। विजयराघवगढ़ विधानसभा की धरती बिरुहली जिसे आज भी श्रद्धा से बाबू जी की बिरुहली कहा जाता है उन मूल्यों की साक्षी है जहाँ एक पिता ने कभी एकता भाईचारे और सेवा के सपने देखे थे। वही सपने आज उनके पुत्र विजयराघवगढ़ विधायक संजय सत्येंद्र पाठक अपने कर्मों से जी रहे हैं। यह सिर्फ पिता की विरासत नहीं बल्कि उनके विचारों की जीवंत यात्रा है। बाबू जी मानते थे कि राजनीति सत्ता नहीं सेवा का माध्यम होनी चाहिए। संजय सत्येंद्र पाठक आज उसी पथ पर निःशब्द निरंतर और निःस्वार्थ चल रहे हैं। उनके लिए जनसेवा कोई अवसर नहीं बल्कि जीवन का स्वभाव है। यही कारण है कि जब वह लोगों के बीच होते हैं तो नेता नहीं परिवार का सदस्य बनकर होते हैं। नूतन वर्ष के अवसर पर बिरुहली में आयोजित विशाल वन भोज इसका प्रत्यक्ष उदाहरण बना।

जंगल की गोद में सजे इस आयोजन में लाखों लोग एक परिवार की तरह जुटे। यह आयोजन भोजन का नहीं भावनाओं का था जहाँ पिता के देखे सपनों की खुशबू और पुत्र के कर्मों की गरिमा स्पष्ट महसूस होती है। संजय सत्येंद्र पाठक स्वयं लोगों के बीच बैठे उनके साथ भोजन किया हालचाल जाना और आशीर्वाद लिया। उस क्षण न मंच था न दूरी बस अपनत्व था। यह दृश्य उस संस्कार को दर्शाता है जो उन्होंने अपने पिता से पाया सबको साथ लेकर चलने का संस्कार।
आज कई लोग उनकी तुलना करना चाहते हैं लेकिन शायद यह भूल जाते हैं कि संजय सत्येंद्र पाठक किसी पद या व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि एक भावना एक विश्वास और एक परंपरा हैं। ऐसी परंपराओं की बराबरी नहीं की जाती उन्हें आगे बढ़ाया जाता है। भारतवर्ष में ऐसे पुत्र विरले होते हैं जो पिता की पहचान को केवल संभालते नहीं बल्कि उसे और ऊँचाई तक ले जाते हैं।
साफ है कि जिनके लिए लाखों लोग दुआ करते हों जिनकी एक पुकार पर जनसैलाब उमड़ पड़े उनका मुकाबला करना नासमझी के अलावा कुछ नहीं। वे राजनीति में अकेले नहीं होते क्योंकि उनके साथ जनता का विश्वास और पिता के संस्कार खड़े होते हैं।नए वर्ष पर बिरुहली का यह आयोजन उन लोगों के लिए किसी पर्व से कम नहीं था जो वर्षभर संघर्ष करते हैं। यह निःशुल्क पिकनिक नहीं बल्कि उस अपनत्व की सौगात थी जो केवल वही दे सकता है जो जनता को अपना परिवार मानता हो।स्वयं संजय सत्येंद्र पाठक बार-बार कहते हैं मैं साधारण इंसान हूँ मुझे भगवान मत कहिए।
मेरी कोशिश बस इतनी है कि मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों के काम आ सकूँ। यही सादगी उन्हें महान बनाती है। राजा वही नहीं जो सिंहासन पर बैठे बल्कि वह होता है जो आम आदमी के बीच बैठकर यह एहसास दिला दे कि सम्मान सबके लिए बराबर है।आज जब लोग संजय सत्येंद्र पाठक को देखते हैं तो उन्हें उसमें केवल एक विधायक नहीं बल्कि अपने पिता की राह पर चलता एक ऐसा पुत्र दिखता है जो सेवा को राजनीति नहीं परिवार की जिम्मेदारी मानता है। यही कारण है कि वह सिर्फ अपने पिता की विरासत नहीं हैं। वे उस विरासत का सबसे सुंदर विस्तार हैं।
शेरा मिश्रा पत्रकार विजयराघवगढ़ कटनी

















