आलेख एवं विचार

हमारा सम्पूर्ण जीवन हमारे विचारों पर केंद्रीय रहता हैं: सिद्धाश्रम रत्न सौरभ द्विवेदी जी

@डेस्क न्यूज। भगवती मानव कल्याण संगठन के केंद्रीय महासचिव व भारतीय शक्ति चेतना पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सिद्धाश्रम रत्न सौरभ द्विवेदी (अनूप भैया) जी नें अपनी सहज-सरल वाणी में एक कार्यक्रम में उपस्थित जन समूह कों सम्बोधित करते हुए कहा कि ” नशामुक जीवन ही सर्वोच्च जीवन हैं, क्योंकि नशामुक्त रहकर ही हर व्यक्ति जीवन की उच्चता कों प्राप्त कर सकता हैं। हमारा स्वतः का जीवन, जब नशे- मांसाहार जैसी बुराइयों से मुक्त होगा, तभी तो हम समाज में जागृति पैदा कर सकेंगे। तो अपने- अपने क्षेत्रों में, गांव- मुहल्लों में नाशमुक्ति के लिए कार्य करें, यदि ऐसा नहीं किया तो आपका अपना घर- परिवार भी नशे से ग्रसित हो सकता हैं, आपके बच्चे भी नशे से ग्रसित हो सकते हैं, क्योंकि जैसा वातावरण होता हैं, मनुष्य उसी अनुरूप ढल जाता हैं। अतः प्रयास करें कि आपके आसपास का वातावरण, आपके गांव- मुहल्लों का वातावरण शुद्ध, सात्विक व पवित्र रहे।

वहीं श्री द्विवेदी नें अपने उद्बोधन में यह भी कहा कि हमारी आत्मा की मूल जननी माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी जगदम्बा हैं और जिनकी साधना- आराधना करने से मन शांत होता हैं और ह्रदय में पवित्रता का वास रहता हैं। अतः अपने-अपने घरों में नित्यप्रति “माँ ” की साधना-आराधना करें और प्रकृति के नियमों के अनुरूप जीवन कों गति दें। सूर्योदय से पहले स्वयं उठें और अपने बच्चों कों भी उठाए, क्योंकि उगते सूर्य कों देखने से, शरीर में पूरे दिन स्फूर्ति बनी रहती है सूर्योदय आपके कल्याण के लिए, जीवन में प्रकाश भर देने के लिए ही होता है।

आपको यदि जीवनपथ पर आगे बढ़ने के लिए सही दिशा नहीं मिल रही है, परेशान है तो पंचज्योति शक्तितीर्थ सिद्धाश्रम आएं, अपने साथ में अपने परिजनों, रिश्तेदारों व इष्टमित्रों को भी लाएं। ऐसी कोई समस्या नहीं हैं जो “माँ”- गुरुवर के आशीर्वाद से दूर न हो सके। आवश्यकता है तो केवल सच्ची भक्ति की, नशे- मांसाहार से मुक्त चरित्रवान्, चेतनावन्, पुरुषार्थी और परोपकारमय जीवन की।

आगे श्री द्विवेदी जी नें यह भी कहा की हमें साधना के पथ पर बढ़ने के लिए और समाज में ब्याप्त विषमताओं कों दूर करने के लिए माता भगवती आदिशक्ति जगत् जननी की आराधना करनी ही पड़ेगी। परम पूज्य सद्गुरदेव श्री शक्तिपुत्र जी महाराज नें कहा हैं कि माता भगवती कों अपनी इष्ट के रूप में अपना लीजिए और नित्यप्रति उनके चरणों के पास बैठकर उनकी आराधना कीजिए इससे आपकी आंतरिक शक्ति जाग्रत् होंगी। उन्होंने यह भी कहा कि अगर स्वयं कों उच्चता की ओर ले जाना हैं और समाज में आपको कुछ करना हैं तो माँ-गुरुवर की भक्ति करनी ही पड़ेगी। सद्गुरदेव जी महाराज नें अपने शिष्यों से कहा हैं कि तुम कुछ करो या न करो, देवी देवताओं के मंदिर जाओ या न जाओ, मगर अपने घर कों, अपने शरीर कों, अपने अंनतःकरण कों, अपने मन कों मंदिर बना लो। मंदिर बनाने से तात्पर्य हैं आपके घर का वातावरण शुद्ध व सात्विक हो, शरीर स्वच्छ हो, अंनतःकरण में पवित्रता हो और मन में अच्छे विचारों का वास हो। भाइयों- बहिनों इतना ध्यान रखें कि हमारा सम्पूर्ण जीवन हमारे विचारों पर केंद्रीत होता हैं। हम जैसा सोचते हैं, वैसे ही बन जाते हैं। अतः अच्छा सोचों और अच्छा कार्य करो, आपकी आंतरिक और बाह्य शक्तियाँ बढ़ने लगेंगी, कार्यक्षमता में वृद्धि होंगी तथा जीवन की सभी परेशानियाँ समाप्त होती चली जायेंगी।

(संकलन- आशुतोष द्विवेदी संपादक शक्ति न्यूज)

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