आलेख एवं विचार

समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग सत्य में संशय करने लगा हैं कि देवी- देवता हैं या नहीं सत्य हैं या नहीं, जो सत्य हर काल में था वह इस काल में भी हैं: परमहंस योगिराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज

@डेस्क न्यूज। आज देश में समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग सत्य में संशय करने लगा हैं कि देवी- देवता हैं या नहीं सत्य हैं या नहीं उन्हें धर्मसाम्राट युगचेतना पुरुष परमहंस योगीराज श्री शक्तिपुत्र बताया हैं कि जो सत्य हर काल में था वह इस काल में भी हैं। हमारे ऋषियों- मुनियों के पास इतनी सामर्थ्य थी कि वह कुछ भी करने में सक्षम थे।

गुरुवर नें कहा शांतचित्त होकर विचार करें कि मानव के रूप में हमें जो जीवन प्राप्त हुआ हैं, तो सुनिश्चित हैं कि एक- न- एक दिन नष्ट भी होगा। आप हरपल विचार करें कि क्या लेकर आएं थे और क्या लेकर जायेंगे? यदि साधनापथ पर चलोगे, तो आपको यह अहसास होने लगेगा कि हम कुछ लेकर नहीं आए थे, लेकिन बहुत कुछ लेकर जा रहे हैं। प्रलोभन तो अपनी तरफ खींचतें ही हैं, मगर वे प्रलोभन पतन के मार्ग पर ले जाते हैं। फिसलना आसान हैं, चढ़ना कठिन होता हैं। किसी जगह से फिसलने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती, आसानी से केवल फिसला जा सकता हैं, मगर फिसलने वाला हर व्यक्ति नीचे की ओर ही जायेगा। फिसलन का तात्पर्य हैं नीचे की ओर जाना और चढ़ने का तात्पर्य हैं ऊपर की ओर जाना।

अतः हर पल विचार करो कि मानव फिसलता- फिसलता अपने संस्कारों कों नष्ट कर चुका हैं आज सत्य कों ही विस्मृत कर चुका हैं। समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग सत्य में संशय करने लगा हैं कि देवी- देवता हैं या नहीं सत्य हैं या नहीं, सत्य हैं या नहीं, हमारे ऋषियों- मुनियों के पास इतनी सामर्थ्य थी कि नहीं, सबकुछ काल्पनिक सा मानने लगे हैं? जो सत्य हर काल में था, वह इस काल में भी हैं। चूकि जब कोशिकाएं संकुचित हो जाती हैं, तो संकुचित होते- होते इतनी शून्यता में आ जाती हैं कि उनको सत्य का अहसास होना बंद हो जाता हैं।

(संकलन- आशुतोष द्विवेदी संपादक शक्ति न्यूज)

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