तपस्यात्मक जीवन जीना होगा और परमार्थ का जीवन जीना होगा, बिना परिश्रम के आज तक किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ है: शिव बहादुर सिंह प्रदेश अध्यक्ष, भगवती मानव कल्याण संगठन शाखा हरियाणा

@हरियाणा। सर्व प्रथम आप सभी को चैत्र नवरात्रि की ढेर सारी शुभ कामनाएँ। बिना परिश्रम के अगर कुछ बड़ा प्राप्त हो भी जाएगा तो जल्दी से आप गवाँ भी बैठेंगे ,अतः पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ गुरुदेव ज़ी क़ी विचारधारा का पालन कीजिये। हम लोग दिन रात इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं कि कैसे भी हो ,हम भोग विलास की वस्तुयें एकत्रित करते रहें।
भौतिकतावाद के इसी झंझावात में फंसकर हम अपना पूरा जीवन खपा देते हैं। सारा जीवन अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये इधर-उधर भटकते रहते हैं ,जबकि जीवन का उद्देश्य इन सभी बातों से ऊपर उठकर तमाम ऐसे रचनात्मक कार्य ऐसे हैं जिन्हें सम्पन्न करके अपने जीवन में सुख और शांति कायम करना होना चाहिये। सर्वप्रथम हमें अपने शरीर का शोधन करना होगा। इसके लिये गुरुदेव जी द्वारा निर्देशित साधना क्रमों को नियमित करना होगा। जब हम नियमित माँ गुरुवर की साधना करने लग जायेंगे तो हम सत्य और असत्य का भेद समझने लग जायेंगे।

जब किसी को भी सत्य और असत्य कार्य का भेद समझ में आने लगता है तो उसे गलत कार्योँ से नफरत होने लगती है। उस व्यक्ति के अन्दर परोपकार की भावना का जन्म होने लगता है। बहुत सारे लोग कहते हैं की हम आर्थिक रूप से मजबूत नहीं हैं तो हम कैसे किसी की सहायता कर सकते हैं ?किसी की मदद करने के लिये आर्थिक पक्ष मजबूत हो ऐसा कत्तई जरूरी नहीं है। “वचने का दरिद्रता” का मतलब आप सभी लोग समझते हैं। मतलब आप अपने वचनों के माध्यम से बहुत सारे लोगों का कल्याण कर सकते हैं। अर्थात लोगों से शालीनता से बातकर करके उनकी मदद कर सकते हैं।
आपके सम्पर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों को आप गुरुदेव जी की विचारधारा से अवगत कराकर देखिये , इसी कार्य से लोगों का भला होने लगेगा। आप सदैव इस भाव से जीवन यापन कीजिये की हमारे साथ अच्छा करने वाले व्यक्ति के प्रति सदैव कृतज्ञता का भाव हम रखेंगे। कलिकाल (कलयुग ) में उल्टी रीति चल रही है कि मदद करने वाले के प्रति राग द्वेष का भाव रखते हैं। ये प्रवृत्ति हमारे प्रगति में बाधा पहुँचाती है। माँ गुरुवर की कृपा प्राप्त करने का सबसे शशक्त माध्यम जन जागरण ही है।
जितना ज्यादा से ज्यादा हो सके उतना अधिक से अधिक लोगों के घरों में हम लोग माँ की आरती और चालीसा पाठ सम्पन्न करा सकें ,हमारे जीवन का मूल लक्ष्य यही होना चाहिये। हम लोगों की सबसे बड़ी कमजोरी ये है कि हम अपनी क्षमता का दुरुपयोग करते हैं। हम घर से बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। हमें आराम परस्ती का जीवन रास आता है। आगे बढ़ने के लिये स्वार्थ की भावना को त्यागकर परमार्थ की भावना को अपनाना होगा। एक दिन ऐसा आयेगा की हमें इन्हीं कार्योँ में आनन्द की अनुभूति होने लगेगी। माँ गुरुवर अपने भक्तों पर सदैव कृपा की बरसात कर रहे हैं पर हम लोग अपनी प्रवृत्ति को परिवर्तित नहीं करना चाहते हैं। नवरात्रि के विशेष अवसर पर हम लोग सन्कल्पित होकर अपने जीवन में नवीन उद्देश्य को लेकर कार्य करें।
आज समाज में चारों तरफ जिधर निगाह उठाकर देखिये सभी तरफ भ्रष्टाचार व्याप्त है। लोग यही चाहते हैं कि क्या ऐसा करें जिससे हम अत्यधिक धन अर्जन कर लें। अनैतिक तरीके से कमाया हुआ धन सदैव हमारे जीवन को क्षति पहुँचाता है। अतः धन अर्जन जरूर कीजिये पर उसका माध्यम उचित कार्य होना चाहिये। हमें अपने जीवन को पारदर्शी बनाना होगा। हमारा जीवन एक खुली किताब की तरह होना चाहिये। कुछ लोग रहस्यात्मक जीवन जीते हैं। अपने बारे में सदैव चाहते हैं कि कोई कुछ हमारे बारे में जान ना ले। ये प्रवृत्ति ठीक नही है। लोग आपके जीवन से प्रेरणा लेकर कार्य करें ऐसा जीवन हमें जीना चाहिये। हमारे कार्य ऐसे होने चाहिये कि लोग हमारे कार्योँ का समाज में उदाहरण प्रस्तुत करें। जब तक हम माँ गुरुवर के प्रत्येक क्रमों का पालन पूरी निष्ठा और भक्ति के साथ नही करेंगे तब तक हमारा जीवन पारदर्शी नही बन पाएगा।
गुरुदेव के शिष्य होकर भी हम लोग अन्मयस्क होकर जीवन जीयें ,ऐसा कत्तई उचित नही है। कार्य ऐसा कीजिये कि लोग अपने घरों में आपके कार्योँ का उदाहरण प्रस्तुत करें। गलत कार्योँ से आजतक किसी को भी कुछ भी हासिल ना ही हुआ है और आगे भी नही हो पाएगा। अपने दिमाग का उपयोग सदैव रचनात्मक कार्योँ में ही कीजिये। साधक प्रवृत्ति को जागृत करने की आज बहुत बड़ी आवश्यकता है। लोगों के कल्याण में ही हमारा कल्याण समाहित हैं।
जै माता की जै गुरुवर की

















