संपादकीय

देशवासियों कों दशहरे की हार्दिक बधाई: रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं –“सत्यं असत्यं असुर संहारा, सत्यं जयते मिथ्या हारा॥”

डेस्क न्यूज@आशुतोष द्विवेदी संपादक। रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं –
“सत्यं असत्यं असुर संहारा, सत्यं जयते मिथ्या हारा॥”

अर्थात असत्य कितना भी प्रबल क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है और सत्य ही सदा विजयी रहता है। यही शिक्षा हमें विजयादशमी देती है, जब श्रीराम ने रावण का वध कर धर्म और मर्यादा की स्थापना की।

यह पर्व केवल लंका-विजय का प्रतीक नहीं बल्कि आत्म-विजय का स्मरण है – भीतर के रावण अर्थात क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को परास्त करने का।

आप जानते हैं कि रावण महान शिवभक्त और वेदों का विद्वान था, पर उसका पतन केवल अहंकार से हुआ?

आप जानते हैं कि अर्जुन ने भी इसी दिन शमी-वृक्ष से अपने शस्त्र निकाले थे और तभी से दशहरे पर शमी-पत्र को स्वर्ण के समान पवित्र मानकर बाँटा जाता है।

महाराष्ट्र में इसे “सोने का आदान-प्रदान” कहा जाता है।

दक्षिण में यह चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर-वध की स्मृति है, और नेपाल में इसे दशैं पर्व के रूप में शक्ति की पूजा से जोड़ा जाता है।

इसीलिए कहा गया है – “धर्मो रक्षति रक्षितः, सत्यं जयति नित्यशः; असत्यं विनश्यति, मिथ्या किं चिरं स्थिरम्॥” – जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है; सत्य सदा जीतता है और असत्य क्षणभंगुर है।

अतः इस विजयादशमी पर संकल्प लें कि हम केवल रावण की मूर्ति नहीं जलाएँगे, बल्कि अपने भीतर छिपे रावणों को भी जलाएँगे।

जय श्रीराम

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