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भविष्य की आहट/ नौकरशाही पर लगता तानाशाही का आरोप: डा. रवीन्द्र अरजरिया

डेस्क न्यूज। देश में जर्मनी प्रतिनिधिमण्डल ने आमद दर्ज की है। केन्द्र सरकार की पहल पर वहां के चांसलर ओलाफ स्कोल्ज ने अपने सहयोगियों के साथ भारत में संभावनायें खोजना प्रारम्भ कर दीं हैं। कंसल्टेंसी फर्म केपीएमजी और जर्मन चैंबर्स आफ कामर्स एब्राड यानी एएचके के एक अध्ययन के अनुसार जर्मन कंपनियां भारत में नौकरशाही, भ्रष्टाचार और टैक्स प्रणाली को निवेश में बाधाओं के रूप में देखतीं हैं। बीसीजी के ब्राउन ने तो यहां तक कह दिया है कि यहां बाजार में पैर जमाने में बाधायें बहुत हैं। समाज के अंतिम छोर पर बैठकर देखा जाये तो भारत का तंत्र पूरी तरह से अंग्रेजों की परम्परा में रचा-बसा नौकरशाहों की मर्जी पर चलता हुआ प्रतीत होता है।

कुछ सालों के लिए आने वाले विधायिका के सदस्यों को कानूनी लचीलेपन की जटिलताओं को रेखांकित करके कार्यपालिका के स्थाई सदस्य व्दारा ऐन-केन-प्रकारेण अपनी सोची समझी योजना के अनुरूप कार्यशैली निर्धारित करवा लेते हैं। दोष सभी सरकारों केे पाले में आता है जबकि उपलब्धियों पर नौकरशाही का एकछत्र राज्य रहता है। तनख्वाय, भत्ते, सुविधायें, संसाधन आदि की प्रचुरता के मध्य विलासता भरे जीवन में सांसें लेने वाले नौकरशाहों को देश की आम आवाम गुलाम की तरह ही दिखाई पडती है। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं ने अनेक बार समय की मांग के साथ संशोधनों के व्दारा अपने स्वरूप को सकारात्मक दिशा में परिवर्तित करने का प्रयास किया किन्तु हर बार नौकरशाहों ने उसमें भी अपने रास्ते निकाल लिये।

गोरों के काल मे नौकरशाहों की तानाशाही ने स्वाधीनता के बाद तो अपनी स्थिति में खासी बढोत्तरी की किया है। कुछ सालों के लिए सत्ता में आने वालों को स्थाई नौकरशाहों का समूह अपने ढंग से कार्य करने के लिये बाध्य कर देता है। सच्चाई तो यह है कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री जैसे ओहदेदार भी एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की अनियमितताओं पर सीधी कार्यवाही नहीं कर सकते हैं। उन्हें उत्तरदायी नौकरशाह को ही निर्देशित करना पडता है। इन निर्देशों को मानने, न मानने के रास्ते भी कानूनी पेंचेदगी के मध्य से ही गुजरते हैं। देश में एक ही तरह के अपराध पर अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग मापदण्ड तय करने वाले अनेक मामले सामने आते रहते हैं। वाहनों पर पद, विभाग आदि का नाम लिखकर चलने वालों को शायद ही कभी अपने अनियमित कार्र्योंं के लिये जुर्माना या दण्ड भरना पडता हो।

सरकारी तंत्र से जुडे सभी विभाग एक दूसरे के साथ लचीला व्यवहार करते देखे जा सकते हंै। पटवारी के व्दारा भू-स्वामी की जमीन के कागजातों पर मनमाना अंकन करने के बाद शायद ही कभी पटवारी, कानूनगो, तहसीलदार के विरुध्द आपराधिक मामला दर्ज हुआ हो, अधिकांश प्रकरणों में अंकन सही करवाने की पहल पीडित को स्वयं करना पडती है। खुलेआम भारी भरकम अतिक्रमण करने वाले प्रभावशालियों को निरंतर अनदेखा करके नौकरशाही व्दारा निरीह लोगों पर कार्यवाही करके लक्ष्य पूर्ति के आंकडे तैयार कर लिये जाते हैं।

लाखों रुपये के बकाया बिजली बिलों के बाद भी सरकारी विभागों, असरदार लोगों, नौकरशाहों के विद्युत संयोजन विच्छेद नहीं किये जाते जबकि आम आवाम के परिस्थितिजन्य कारणों से बिल भुगतान में होने वाली देरी हेतु उसे तत्काल दण्डित कर दिया जाता है। वाहन चौकिंग के दौरान नियमों की धज्जियां उडाने वाले स्थानीय असरदार लोगों तथा नौकरशाहों के वाहनों को नजरंदाज करके दूर-दराज के जिलों, प्रदेशों में पंजीकृत वाहनों का नम्बर देखकर प्रत्यक्ष और ई चालान काट दिये जाते हैं ताकि वसूली का आंकडा पार किया जा सके। रेल में यात्रा के दौरान शयनयान में तो स्वयं की आरक्षित सीट पर कब्जा पाना भी बेहद कठिन हो गया है। अब तो हालात यहां तक पहुंच गये हैं कि खाकीधारी, रेल कर्मचारी, दैनिक यात्रा के पासधारियों व्दारा दबंगी के साथ वातानुकूलित कोचों पर भी जबरन कब्जा किया जाने लगा है।

सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए पात्र व्यक्तियों को आवेदन करने में ही नाकों चने चबाने पड रहे हैं जबकि नौकरशाही तक सीधा सम्पर्क रखने वालों के आवेदनों को सत्यापन के बिना ही स्वीकृत किये जाने वाली घटनायें अक्सर सुर्खियां बनती रहतीं हैं। पुलिस के डंडे से बचने का उपाय अपराधविहीन गतिविधियां, निर्दोष स्थिति या कानूनी धाराओं का अनुपालन नहीं बल्कि नौकरशाहों के फरमानों को आंख बंद करके मानना है। कब किसे आरोपी बना कर पेश कर दिया जाये और कब किसे गवाह के रूप में प्रदर्शित कर दिया जाये, यह सब नौकरशाहों के स्वविवेक पर निर्भर करता है। सरकारी चिकित्सालयों में तैनात चिकित्सकों के बंगलों, निजी क्लीनिकों, व्यक्तिगत अस्पतालों में मरीजों की भीड देश भर में देखी जा सकती है। ओपीडी में डाक्टर की खाली कुर्सी पर प्रश्न उठाने पर राउण्ड पर हैं, रेस्ट पर हैं, आपरेशन में हैं, मीटिंग में हैं, कोर्ट गये हैं, जैसे बहाने पहले से ही तैयार रहते हैं। वार्ड में जगह पाने के लिए भी सरकारी चिकित्सक के आवासीय क्लीनिक पर सशुल्क आमद दर्ज करना या फिर पहुंच वालों से सिफारिश लगवाना आवश्यक बन गया है।

योजनागत ऋण हेतु बैंक के नियमों के अलावा वहां तैनात अधिकारियों के अपने अलग मापदण्ड भी व्यवहार में देखने को मिलते हैं। सरकारी विभागों में वाहनों के अनुबंध की व्यवस्था के तहत ज्यादातर वाहनों में प्रदेश का नाम लिखकर शासन लिख दिया जाता है ताकि वह सरकारी वाहन की श्रेणी में समझा जाये। वाहन के कागजात चैक करने हेतु ई-सुविधा होने के बाद भी सरकारी वाहनों की खामियां कभी भी पोर्टल पर दिखाई नहीं देतीं। केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकारों तक के अधिकांश विभागीय पोर्टल, वेबसाइट आदि को लम्बे समय से अपडेट न करने के बाद भी उत्तरदायी नौकरशाह से उत्तर तक नहीं मांगा जाता है।

भ्रामक जानकारियों, वास्तविक दस्तावेजों को छुपाना, पुराने नियमों का प्रदर्शन करना, आवश्यक सामग्री का प्रकाशन न करना, उलझी हुई प्रक्रिया प्रस्तुत करना, आनलाइन दस्तावेज अपलोड करने वाली स्थितियों पर साइट का डाउन रहना, जैसे अनगिनत कारक केवल और केवल नौकरशाहों की ही देन हैं। सूचना का अधिकार तो ज्यादातर स्थानों पर उपेक्षा का पात्र बनकर रह गया है। जनसूचना अधिकारी की शिकायत हेतु विभागीय प्रथम अपीलीय अधिकारी से करने की व्यवस्था होने के कारण अधिकारी-अधिकारी भाई-भाई का नारा पर्दे के पीछे से बुलन्द होता रहता है। व्दितीय अपीलीय अधिकारी के रूप में राज्य सूचना आयोग होने के कारण उनके कार्यालयों में आवेदनों की भरमार रहती है। कार्य का दबाव होने से त्वरित गति से न्याय पाना बेहद कठिन है।

तहसील दिवस, थाना दिवस, आनलाइन शिकायत, मुख्यमंत्री शिकायत प्रकोष्ठ जैसे प्रयास भी नौकरशाहों की व्यक्तिगत कार्यप्रणाली के कारण लगभग दम तोड चुके हैं। अधिकांश सरकारी दफ्तरों में नियमत: कार्य करने का निवेदन सुनकर ही वहां कार्यरत नौकरशाह भडक उठते हैं। वहां लगे सीसीटीवी पर वे जोर-जोर से चिल्लाते हुए आवेदक को ही दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं। उन सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी विभागाध्यक्ष के पास ही संकलित होती है जिसे पीडित आवेदक व्दारा मांगे जाने पर तकनीकी खराबी का बताकर मनाकर दिया जाता है जबकि सरकारी कार्य मे व्यवधान उत्पन्न करने हेतु प्राथमिकी दर्ज करने की धमकी देकर पीडित को ही प्रताडित करने के अनेक उदाहरण समय-समय पर सामने आते रहे हैं।

साइबर युग में तेजी से विकास के साथ कदम रखने की पहल एक सराहनीय प्रयास है परन्तु नौकरशाहों व्दारा साइबर क्राइम को रोकने, पीडित को न्याय दिलाने, अपराधी को दण्ड दिलाने, तत्काल सुनवाई करने की प्रभावशाली व्यवस्था न होने से भविष्य के अंधकार की संभावनायें बनने लगी है। अनगिनत संवेदनशील शिकायतों पर प्रभावी कार्यवाही के चन्द उदाहरण ही सामने आते हैं जिनका ढिंढोरा पीटकर नौकरशाह अपनी पीठ स्वयं ठोकते रहते हैं। शायद देश की यही छवि जर्मनी कंसल्टेंसी फर्म केपीएमजी और जर्मन चैंबर्स आफ कामर्स एब्राड यानी एएचके के विशेष अध्ययन के दौरान सामने आई होगी, तभी तो उसने अपने प्रकाशन में भारत की समस्याओं को रेखांकित करते हुए नौकरशाहों को कटघरे में खडा किया है। यदि समय रहते हम इस मकड जाल से मुक्त नहीं हुए तो निश्चय ही आम आवाम को नौकरशाहों की यह अघोषित गुलामी एक पीडादायक युग में ले जायेगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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