आध्यात्मिक

अनेकों साधु-संत- सन्यासी समाज के बीच आते हैं और गुमराह होकर धनलोलुपता में चाटुकारिता में लग जाते हैं, कोई राजनेताओं की कोई किसी धनवालों की: योगिराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज

@आध्यात्मिक। धर्मसाम्राट युगचेतना पुरुष परमहंस योगिराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज नें अपने चिंतन में कहा की जिस तरह आज अनेकों साधु-संत- सन्यासी समाज के बीच आते हैं और गुमराह होकर धनलोलुपता में चाटुकारिता में लग जाते हैं, कोई राजनेताओं की कोई किसी धनवालों की धर्म उन कथवाचकों से प्राप्त नहीं हो सकता। उन्होंने कहा की मैंने बार-बार कहा हैं और यह अहंकार की बात नहीं हैं। मैंने एक किसान परिवार में जन्म लिया हैं। मेरे सब विचार समाज से होते हैं। समाज के अनेकों लोगों के अंदर यह विचार बनने लगते हैं कि शायद गुरुदेव जी महाराज अपने अहंकार की बात कर रहे हैं। मैंने कहा हैं कि अहंकार आने के पहले मैं इस शरीर कों त्याग देना पसंद करूंगा। मगर मेरे सामने मज़बूरी हैं, मेरे सामने समस्या हैं कि जिस लक्ष्य कों लेकर प्रकृतिसत्ता नें मुझे समाज के बीच भेजा हैं, अगर उस लक्ष्य की ओर मैं नहीं बढ़ा, उस समाज कों उस दिशा से खींचकर उस सत्यपथ की ओर नहीं बढ़ाया तो, जिस तरह अनेकों साधु -संत- सन्यासी समाज के बीच आते हैं और गुमराह होकर धनलोलुपता में, चाटुकारिता में लग जाते हैं, कोई राजनेता की चाटुकारिता में लगा हैं, कोई किसी धनवालों की चाटुकारिता में लगा हैं और कथा- कहानियों में दिन में राम- राम और रात में पऊवा चढ़ाये जाते हैं। उस मार्ग में यह शरीर नहीं जा सकता। यह शरीर किसी से भावनाओं के अलावा और किन्ही कामनाओं कों लेकर उपस्थिति भी नहीं होता। “माँ” नें मुझे जो लक्ष्य दिया हैं, उसकी सामर्थ्य मुझमें भरी हैं। उस सामर्थ्य कों जन- जन में बॉटना ही मेरा कार्य हैं। तुम्हारे अन्दर पड़े हुए वे आवरण जो कुण्डलनी चेतना कों ढके हुए हैं, उन्हें हटाना ही मेरा कार्य हैं।

गुरुदेव कहते हैं कुण्डलनी चेतना के बारे में जो पुस्तकों में अनेक प्रकार से दिया गया हैं की आप पहले मूलाधर पर ध्यान करें तथा सातों चक्रो के बारे में जो वर्णन दिया गया हैं, तो मैंनें बार-बार कहा हैं कि आपको किसी चीज से भ्रमित होने की जरुरत नहीं हैं। केवल मेरुदण्ड कों सीधा कीजिए चैतन्यता से बैठिये और अपने आज्ञाचक्र कों माध्यम बना लीजिए। आज्ञाचक्र पर ध्यान लगाने का प्रयास कीजिए। अपने आपको शांत करने का प्रयास कीजिए तथा प्रकृतिसत्ता का स्मरण करने का प्रयास कीजिये। जो मंत्र उच्चारण कर रहे हो, उस मंत्र पर ध्यान देने का प्रयास कीजिये। आज्ञाचक्र में अलौकिक क्षमता भरी हुई हैं। आज्ञाचक्र राजाचक्र कहलाता हैं और कहते भी हैं कि यदि हम राजा की शरण में चले जायें, तो हमारी समस्त समस्याओं का निदान हो जाता हैं। मैं आजकल के कलियुगी राजाओं की बात नहीं कर रहा हूं। यह सत्य का चक्र हैं। वह आज्ञाचक्र हैं, जिसका प्रकृतिसत्ता नें निर्माण किया हैं। वहाँ पर कोई भेदभाव नहीं होता, कोई फर्क नहीं होता। वह आपसे कोई सेवा नहीं चाहता तथा यह कामना नहीं करता कि मेरी इच्छाओं की पूर्ति करो। इच्छाओं की पूर्ति तो शरीर चाहता हैं। वह चक्र, जो सिर्फ एक बार स्मरण करने मात्र से आपकी सहायता के लिए खुलने लगता हैं, केवल उस आज्ञाचक्र की शरण में जाओ।

गुरुदेव नें कहा हैं यह राजा चक्र हैं। आप यदि इस पर ध्यान लगानें का प्रयास करेंगे, तो राजा का कर्म खुद ही जाग्रत हो जायेगा और आपके मूलाधार से सहस्त्रार, स्वाधिनिष्ठा, ये सब चक्र एक के बाद एक धीरे- धीरे चैतन्य होने लगेंगे। आपके अंदर की कार्यक्षमता बढ़ेगी। यह क्रम एक छोटा बच्चा भी कर सकता हैं, एक युवा भी कर सकता हैं, एक नारी भी कर सकती हैं और एक बृद्ध भी कर सकता हैं। योग नितांत आवश्यक हैं, मगर बृद्ध अगर चाहे भी तो वे योग की बाहरी क्रियाओं में नहीं लग सकते। अगर आप बाह्य क्रियायें नहीं कर सकते, तो मैंने “माँ” और “ॐ” के उच्चारण काएक मार्ग बताया हैं। वह सरल मार्ग बताया कि क्रम से एक बार “माँ ” और एक बार “ॐ” का उच्चारण किस प्रकार करना हैं। अंतरंग योग कों जाग्रत करो। बहिरंग के लिए आपके पास हो सकता हैं, उतना समय न हो। जो कर सके, वह बहुत अच्छा हैं।

(संकलन- आशुतोष द्विवेदी संपादक शक्ति न्यूज)

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