मां कर्मा देवी जयती हर्षोल्लास के साथ मनाई गई

गढ़ाकोटा रिपोर्टर पीएल पटेल। भक्त शिरोमणि मां कर्मा देवी जी की जीवन गाथा धार्मिक सामाजिक आध्यात्मिक क्षेत्र में तैलिक जाति का मान सम्मान बढ़ाने वाली भक्त शिरोमणि मां कर्मा देवी का जन्म चैत्र कृष्ण एकादशी संवत् 1073 को झांसी में हुआ था। इनकी माता श्रीमति कमला देवी पिता श्री राम शाह जी थे। बचपन से ही भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थी मां कर्मा देवी। मां कर्मा देवी का विवाह नरवर के चतुर्भुज शाह से हुआ।
उसी समय की बात है कि नरवर गढ़ के राजा नल के हाथी को खुजली रोग हो गया।तेली समाज समृद्ध एवं खुशहाल था लोग तेली जाति के लोगों से मन ही मन ईर्षा करते थे इसी कारण राजा नल के चाटुकारों (चमचों) ने सलाह दी कि यदि हाथी को तेल से भरे तालाब में नहलाया जाए तो हाथी की खुजली ठीक हो जाएगी। राजा नल ने तेलकारों को आदेश दिया कि सभी तेलकार तेल पेर कर तालाब में डालें जिससे तालाब तेल से भर जाए, और खुजली पीड़ित हाथी को नहलाया जाए। ऐसा न करने पर सभी तेलकारों को मरवा दिया जाएगा। राजा का आदेश सुनकर सभी तेलकार कोलू से तेल पेर कर तालाब में डालने लगे जिससे तेल का व्यापार बंद हो गया।
इस कारण तेलकारों को भूखा मरने की नौबत आ गई। जब तेल से मोतिया तालाब नहीं भरा तब सभी समाज बंधुओ ने मां कर्मा देवी से प्रार्थना की राम शाह की पुत्री कर्मा देवी ने भगवान नटवर नागर से प्रार्थना की। मां कर्मा देवी की पुकार भगवान कृष्ण ने सुनी। मां कर्मा देवी ने आकाशवाणी अनुसार तालाब में घड़े से तेल की धार डालना शुरू किया तेल की धार लगातार चलती रही। तालाब तेल से भर गया। नरवर गढ़ की सड़कों, गलियों में तेल की बाढ़ आ गई। और नरवर गढ़ में हाहाकार मच गया। राजा रानी यह करिश्मा देखकर मां कर्मा देवी के पास तालाब पर गये। दोनों ने मां कर्मा देवी से क्षमा याचना की और कहा कि तेल की धार बंद करो और हमें क्षमा करें नहीं तो पूरा राज्य नष्ट हो जाएगा। मां कर्मा ने घड़े को सीधा कर तेल की धार बंद कर दी। साथ ही सभी स्वजातीय बंधुओ से कहा आप सभी नरवर गढ़ छोड़कर चले जाए।
ऐसे अन्यायी राजा के राज्य में रहना ठीक नहीं है। मां कर्मा देवी झांसी में आ गई झांसी में मां कर्मा देवी पर विपत्ति आ गई पति बीमार हो गए।कई विद्वान वैद्यों के उपचार के बाद भी उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और चतुर्भुज शाह का स्वर्गवास हो गया। मां कर्मा देवी का बुरा हाल हो गया। मां ने कृष्ण जी से प्रार्थना की और कहा तुमने यह क्या किया। तभी आकाशवाणी हुई तू सती होना चाहती है लेकिन ऐसा करना पाप है तेरे गर्भ में बालक है तू धीरज रख, मैं जगन्नाथपुरी में साक्षात् दर्शन दूंगा। कुछ दिन बाद मां कर्मा देवी ने एक पुत्र को जन्म दिया।
3 साल के अपने पुत्र को नाना नानी के पास सोते हुए छोड़कर जगन्नाथपुरी को पैदल ही चल पड़ी। खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं था। केवल पोटली में भगवान श्री कृष्ण की खिचड़ी बंधी हुई थी। एक दिन भूख प्यास से व्याकुल चलते हुए गिर पड़ी और बेहोश हो गई। जब वह होश में आई तो अपने आप को जगन्नाथपुरी में पाया। जब मां ने द्वारपालो से पूछा कि यह कौन सी जगह है। तो द्वारपालों ने कहा यह जगन्नाथपुरी है।
यह सुनकर मां कर्मा ने भगवान के दर्शन के लिए दौड़ लगा दी।लेकिन द्वारपालों ने फटे पुराने कपड़े पहने मां कर्मा को धक्के देकर बाहर बहुत दूर कर दिया। समुद्र के किनारे पड़ी मां ने भगवान से आंसू बहाते हुए प्रार्थना की तभी आकाशवाणी हुई कि मैं मंदिर में नहीं सच्चे दिल में रहता हूं। मां आंखें खोलो। मां ने आंखें खोली। तो भगवान जगन्नाथ की मूर्ति सामने थी। जगन्नाथपुरी में हल चल मच गई थी कि मंदिर से मूर्ति गायब है। पंडितों ने मां कर्मा के सामने मूर्ति देखकर मारने दौड़े।
तभी आकाशवाणी हुई कोई भी मां को हाथ ना लगाए तुम लोगों ने मेरी भक्त मां को धक्के देकर दूर कर दिया था। मैं उसी को दर्शन देने आया हूं। मां कर्मा देवी ने अपने साथ लाई खिचड़ी को खोला और भगवान जगन्नाथपुरी जी को भोग लगाया। एवं सभी को प्रसाद बांटा। भगवान जगन्नाथपुरी जी ने कहा मैं नित्य तुम्हारी खिचड़ी खाने आऊंगा। तभी से भगवान जगन्नाथपुरी जी को सर्वप्रथम प्रतिदिन भक्त शिरोमणि मां कर्मा देवी की खिचड़ी का भोग लगाया जाने लगा।
जगन्नाथ का भात।
जगत पसारे हाथ।।
ऐसी थी हमारी मां कर्मा देवी

















