डॉ. महेश कुमार को कृषि पादप रोग विज्ञान में पीएचडी की उपाधि, शोध से किसानों को मिलेगा सीधा लाभ
हमीरपुर@अजय शिवहरे। शिक्षा और शोध के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान देने वाले महेश कुमार, जो मूलतः उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जनपद स्थित ग्राम छानी खुर्द, पोस्ट छानी बुजुर्ग के निवासी हैं, ने अपनी मेहनत और समर्पण के बल पर न केवल शैक्षणिक उपलब्धियों की ऊंचाइयों को छुआ है, बल्कि अपने शोध कार्यों से किसानों के लिए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किए हैं। हाल ही में भोपाल स्थित कुशाभाऊ ठाकरे हॉल इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में आयोजित रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के तीसरे दीक्षांत समारोह में उन्हें कृषि पादप रोग विज्ञान विषय में ‘डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी’ की उपाधि से नवाजा गया।


यह सम्मान उन्हें मध्य प्रदेश के माननीय उपमुख्यमंत्री श्री राजेन्द्र शुक्ल, रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री संतोष चौबे एवं अन्य विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति में प्रदान किया गया। यह उपाधि डॉ. महेश कुमार के अथक परिश्रम, नवाचारपरक शोध और किसानों की समस्याओं के प्रति उनकी गंभीर समझ का प्रतीक है। डॉ. महेश कुमार का जन्म हमीरपुर जिले के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। इनके पिता श्री भवानी दीन प्रजापति एवं माता श्रीमति देवकली ने सीमित संसाधनों में रहते हुए भी अपने पुत्र को उच्च शिक्षा दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही प्राथमिक विद्यालय से हुई। इसके पश्चात उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी से उच्च शिक्षा प्राप्त की। स्नातक शिक्षा ब्रह्मानंद डिग्री कॉलेज, राठ से प्राप्त करने के बाद उन्होंने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय कैंपस से ही कृषि विषय में परास्नातक (पीजी) की पढ़ाई की। अपनी परास्नातक शिक्षा के दौरान ही डॉ. महेश कुमार ने भारतीय चरागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान, झाँसी में डॉक्टर प्रदीप सक्सेना के मार्गदर्शन में ‘बरसीम में स्टेम रॉट रोग की पहचान एवं उसका प्रबंधन’ विषय पर शोध कार्य किया। यह कार्य पशुपालन व दुग्ध उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ, जिससे बरसीम की गुणवत्ता एवं उत्पादन क्षमता में वृद्धि संभव हो सकी।
शोध की इस प्राथमिक सफलता के पश्चात डॉ. महेश ने भोपाल की प्रतिष्ठित रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य आरंभ किया। 2019 बैच में विश्वविद्यालय के कृषि संकाय, प्लांट पैथोलॉजी विभाग में पीएचडी में प्रवेश लिया। अपने शोध कार्य हेतु उन्होंने ‘चने में उक्टा रोग का इको फ्रेंडली प्रबंधन’ विषय को चुना, जिसका सीधा संबंध किसानों की समस्याओं से था। डॉ. महेश कुमार ने देखा कि विंध्याचल क्षेत्र में चने की फसल में उक्टा रोग का अत्यधिक प्रकोप है, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। उन्होंने इस समस्या के समाधान हेतु “इको फ्रेंडली मैनेजमेंट ऑफ फ्यूजेरियम विल्ट ऑफ चिक पी (सिसर एरियटिनम एल.) कॉज़ बाई फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम एफ. स्पेसीज सिसरी फॉर विंध्यान प्लैटअउ ऑफ मध्य प्रदेश” शीर्षक से शोध कार्य किया। शोध में उन्होंने तुलसी, नीम, लहसुन, धतुरा जैसे पौधों के अर्क का छिड़काव कर रोग नियंत्रण का अध्ययन किया। इसके साथ ही ट्राइकोडर्मा विरिडी एवं ट्राइकोडर्मा हरजियानम जैसे जैविक कवक नाशकों से बीज व मृदा उपचार कर रोग की रोकथाम के प्रभावी परिणाम प्राप्त किए।

















