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भविष्य की आहट/ सरकारी सुरक्षा में रहने वाले राष्ट्रद्रोहियों को करना होगा चिन्हित: डा. रवीन्द्र अरजरिया

डेस्क न्यूज। राष्ट्रभक्तों की कमाई पर अव्यवस्था फैलाने वालों को सुरक्षा प्रदान करने वाली नीतियां बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं। देश के ईमानदार करदाताओं से वसूली जाने वाली धनराशि का एक बडा हिस्सा राजनैतिक दलों के आकाओं से लेकर कथित प्रभावशाली लोगों की सुरक्षा में खर्च किया जा रहा है।

ऐसे लोगों का एक बडा तबका सरकारी सुरक्षा में आनन्दित जीवन जीते हुए अपने वक्तव्यों, आचरणों और कृत्यों से जातिगत उत्तेजना, सम्प्रदायगत वैमनुष्यता सहित राष्ट्रविरोधी वातावरण तैयार करने में निरंतर लगा हुआ है। विदेशी ताकतों की कठपुतली बने ऐसे लोगों का उपयोग देश के अन्दर वैमनुष्यता फैलाने, आन्तरिक कलह पैदा करने तथा राष्ट्र को अस्थिर करने लिये निरंतर किया जा रहा है। सरकारी सुरक्षा घेरे में रहने वाले अनेक लोगों व्दारा सार्वजनिक रूप से उत्तेजनात्मक कार्य निरंतर किये जा रहे हैं। कहीं जातिगत खाई चौडी करने की घातक योजनाओं को अमली जामा पहनाने की कसमें खाई जा रहीं हैं तो कहीं साम्प्रदायिक ज्वालामुखी फोडने की कोशिशें हो रहीं है। बंगाल में तो केन्द्र सरकार के बाद अब उच्चतम न्यायालय के आदेशों को भी न मानने की सरेआम घोषणा की जा रही है।

आश्चर्य तो तब होता है जब कानूनी रूप से सुरक्षा पाने वाले लोग ही कानून की धज्जियां उडाने जैसे कृत्य करते हैं और उन पर कोई प्राथमिकी तक दर्ज नहीं होती। इसके लिए बंगाल एक जीता जागता उदाहरण है जहां केन्द्रीय एजेन्सियों तक पर गुण्डों की जमातें हावी होती रहीं हैं। एक खतरनाक आरोपी को बचाने हेतु वहां की सरकार ने उच्चतम न्यायालय तक के दरवाजे पर दस्तक दी थी। अब शिक्षकों की नियुक्ति वाले प्रकरण में तो वहां की तृणमुल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उच्चतम न्यायालय के आदेश तक को मानने से इंकार कर दिया है, फिर भी वे खुलेआम प्रदेश सरकार की मुखिया बनी बैठीं हैं। दिल्ली राज्य की विगत सरकार में आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल ने तो सलाखों के पीछे से ही सरकार चलाई थी। जम्मू-कश्मीर की नेशनल कान्फ्रेंस सरकार के मुखिया उमर अब्दुल्ला ने तो राज्य को मुस्लिम राज्य के रूप में प्रचारित करना भी शुरू कर दिया है। इन कुछ उदाहरणों के अलावा अनगिनत घटनायें हैं जो सुरक्षा घेरे में रहने वालों के राष्ट्रद्रोही कार्यों को उजागर करतीं हैं।

साम्प्रदायिक तनाव के जन्मदाताओं को राष्ट्र विरोधी कार्य करने के पूरी छूट दी गई है। वे जहां चाहें, जो चाहें, करें। उनके सारे अपराधों को निरंतर अदृष्टिगत करने का रिवाज स्वाधीनता के पहले चल रहा था जिसे देश के संविधान मे निःसंकोच स्थान देकर ᳚᳚᳚समरथ को नहिं दोष गोसाईं ᳚ वाली कहावत से जुडी व्यवस्था को यस का तस लागू कर दिया गया ताकि प्रभावशाली लोगों को कानून के दायरे से बाहर रखा जा सके। एक समय था जब सत्ता के अहंकार में डूबी बहुजन समाज पार्टी ने सार्वजनिक मंचों से जातिगत नामों के साथ…जूता मारो सालों को, जैसे नारे बुलंद किये थे। वर्तमान में वैसा ही वातावरण आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा नगीना के सांसद चन्द्रशेखर आजाद रावण व्दारा निर्मित करने का प्रयास हो रहा है। मुसलमानों का रहनुमा बनने की कोशिश में लगे आल इण्डिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सुल्तान असदुद्दीन ओवैसी तो हमेशा से ही कथित रुप से देश में साम्प्रदायिक आग लगाने का काम करते रहे हैं। मजहब के नाम पर सियासत करने वालों में वे अकेले नहीं हैं। भारतीय जनता पार्टी की उमा भारती से लेकर योगी आदित्यनाथ तक के नाम भी ऐसे ही नेताओं की श्रेणी में शामिल है जिन्होंने हमेशा ही भेद डालो, राज करो का सिध्दान्त अपनाया है।

यूं तो देश की स्वाधीनता के तत्काल बाद ही मजहब के नाम पर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का बटवारा हुआ था परन्तु तब तत्कालीन प्रायोजित नेताओं ने अपने आकाओं व्दारा पूर्व निर्धारित षडयंत्र के तहत हिन्दुस्तान को हिन्दुस्तान नहीं बनने दिया और कथित धर्म निरपेक्षता की आड में विष वृक्ष का बीजारोपण कर दिया था। उस समय बंगाल लेकर पंजाब तक, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक अहिंसावादियों की लाशों का भयावह मंजर था जिस पर बैठकर सियासत करने वालों की आगामी पीढियों ने आने वाले समय में जनसंख्या के अनुपात को एकपक्षीय करने की नियत से हिन्दुओं की जबरन नसबंदी करवायी, अल्पसंख्यकों के नाम पर सुविधाओं के पिटारे खोले और पात्र उम्मीदवारों की प्रतिभा का कत्ल करके अयोग्य लोगों को आरक्षण के नाम पर सरकारी तंत्र में बैठाया ताकि वे चयनित सरकारी सेवकों को कठपुतली बनकर नाचते रहें। यह सत्य है कि गुजरे जमाने की धूल झाडने से छुपे नासूरों का मवाद एक बार फिर अपनी दुर्गन्ध से वातावरण को प्रदूषित कर देगा परन्तु अतीत की गवाही पर वर्तमान का भविष्य टिका होता है।

आज के हालातों को देखकर आने वाले कल की सुखद कल्पनायें करने की तरंगें भी साथ छोडती नजर आ रहीं है। आगामी दस वर्षों में सब कुछ बतलने की संभावा बलवती होती जा रही है। सरकारी खर्चे पर सुरक्षाकर्मियों के घेरे में रहने वाले अनेक लोगों को लाल बत्ती की सौगातें भी मिलीं हैं। उनके लिए प्रोटोकाल की व्यवस्था भी की गई है। ऐसे लोगों के उत्तेजनात्मक और घातक शब्दों को प्रयोग करते हैं जिन्हें अनेक प्रायोजित मीडिया हाउस वरदान की तरह स्वीकार करके उन्हें प्रमुखता से समाज के सामने प्रस्तुत कर देते हैं। किसी भी व्यक्ति, समाज या सम्प्रदाय के विरुध्द अपमानजनक शब्दों को परोसने वालों को इस कृत्य के लिए उपहार स्वरूप सुरक्षा का एक और घेरा प्रदान कर दिया जाता है ताकि वे बिना किसी डर-भय के अपनी हकरतें जारी रख सकें।

ऐसे लोग अपनी राष्ट्रद्रोही विचारधारा को व्यक्त करके ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा चर्चित और ज्यादा लोकप्रिय हो जाते हैं। दूसरी ओर घातक वक्तव्यों पर प्रतिक्रिया स्वरूप उठने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले कृत्यों को असंवैधानिक बताते हुए कानूनी शिकंजा कसा जाता है। कहीं आतंक को भीड मानकर माफी दी जाती है तो कहीं स्वाभाविक विरोध को भी अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। कानून को हाथ में लेने वाले, सरकारी-निजी सम्पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले, पूर्व नियोजित षडयंत्र का अंग बनने वाले प्रभावशाली लोगों के आपराधिक कृत्यों पर अक्सर न तो स्वतःसंज्ञान ही लिया जाता है और न ही आम आवाम के आवेदनों पर प्राथमिकी ही दर्ज होती है।

ऐसे राष्ट्रद्रोहियों की सुरक्षा, व्यवस्था और सुविधाओं पर देश के ईमानदार करदाताओं के खून-पसीने की कमाई को लुटाया जा रहा है। वे थप्पड मारें तो ठीक, उनका विरोध करने की कोशिश भी अपराध। वास्तविकता तो यह है कि राष्ट्रद्रोहियों को मिलने वाली सरकारी सुरक्षा समाप्त होते ही राष्ट्रभक्तों व्दारा उन्हें उनकी कलुषित मानसिकता का परिणाम मिलते देर नहीं लगेगी। लाल बत्ती और सुरक्षाकर्मियों के हटते ही कथित प्रभावशाली व्यक्ति को राष्ट्रविरोधी षडयंत्र का अंग बनने के पहले लाख बार सोचना पडेगा। अब समय आ गया है जब सरकारी सुरक्षा में रहने वालों में राष्ट्रद्रोहियों को चिन्हित करने के लिए आम आवाम को आगे आना होगा तभी मेहनत की कमाई का उपयोग राष्ट्र के विकास में हो सकेगा। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नई आहट के साथ फिर मुलाकात होगी।

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