जीवन की असली पूंजी पद प्रतिष्ठा या व्यवस्था नहीं बल्कि वह पल है जो दिल को सच्ची मुस्कान दे सके: पंडित गोपाल भार्गव

@गढ़ाकोटा- पीएल पटेल। जीवन की आपाधापी के बीच आज वर्षों बाद अपने गृह नगर गढ़ाकोटा में आयोजित मेला रहस में झूलों पर झूलने का अवसर मिला तो लगा मानो समय ने जीवन में कुछ पल के लिए पीछे लौटने का अवसर दे दिया हो।

कभी सावन और संक्रांति के अवसर पर लगने वाले मेलों की रौनक ही अलग होती थी। भीड़, चहल-पहल, रंग-बिरंगी दुकानों की कतारें तब मैं मित्रों के साथ मेला घूमने जाया करता था, जहाँ परंपरागत लकड़ी के हिडोले में कुछ पैसों की टिकिट लेकर उत्साह के साथ झूलने का अद्भुत आनंद मिलता था, — सब कुछ आज भी स्मृतियों में सजीव है। उस समय परंपरागत लकड़ी के झूले, जिनमें कुछ पैसों की टिकट लेकर हम उड़ान भरते थे, वही हमारे लिए दुनिया का सबसे बड़ा रोमांच थे। आधुनिक झूलों की चमक-दमक भले आज अधिक हो, पर उस दौर की आत्मीयता और अपनापन कहीं अधिक गहरा था।

सावन के महीने में पटेरिया जी स्थित इमली के मजबूत पेड़ों पर रस्सी बाँधकर झूलना, मिट्टी की सौंधी खुशबू, पेड़ की डाल पर बंधी रस्सी की चरमराहट और साथियों की खिलखिलाहट — वह सादगी भरा आनंद आज भी मन को भीगा देता है। उन झूलों में दिखावा नहीं था, लेकिन दिलों में सच्ची खुशियाँ थीं।

फिर समय बदला… बचपन से किशोरावस्था और युवावस्था आई, और राजनीति के पथ पर कदम बढ़ाते ही जीवन की आपाधापी में वह निश्छलता कहीं दूर छूट गई। जिम्मेदारियों ने मुस्कुराहटों की जगह ले ली। कभी-कभी महसूस होता है कि बचपन के वे सुनहरे दिन बहुत सस्ते थे, और आज की व्यस्त दुनिया बहुत महंगी।

आज जब मेले के झूलों पर बैठा तो लगा जैसे स्मृति-पटल पर जमी धूल हट गई हो। मन ने फिर से वही उड़ान भरी, वही बेफिक्री महसूस की।
सच ही तो कहा है
मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह ने—
“ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी…”
मेले के झूलों ने आज फिर याद दिलाया कि जीवन की असली पूंजी पद, प्रतिष्ठा या व्यस्तता नहीं, बल्कि वे पल हैं जो दिल को सच्ची मुस्कान दे सकें। बचपन भले लौटकर न आए, पर उसकी स्मृतियाँ हमें हर बार भीतर से नया बना जाती हैं।

















