आध्यात्मिक

भययुक्त जीवन भी कोई जीवन है!: धर्मसम्राट युगचेतना पुरुष परमहंस योगिराज श्री शक्तिपुत्र जी महाराज

@आध्यात्मिक। इन्द्रियों की क्षणिक परितृप्ती के लिए जो कार्य किया जाता है, उसे “काम” कहते है और आत्मिक परितृप्ती के लिए जो कार्य किया जाता है उसे “प्रेम” कहते है। वर्तमान समय में तो “प्रेम” की परिभाषा ही बदल गई है। कामान्ध व्यक्ति “काम” कों ही “प्रेम” मान बैठे है, जबकि शारीरिक आकर्षक और उसे पाने की लालसा प्रेम नहीं हैं।

ध्यान रखें कि काम कों प्रेम समझने वाले दुराकांक्षापरायण (बुरी इच्छा रखने वाले) व्यक्ति कभी भी सुखी नहीं हो सकते और ऐसे लोग पाप के दलदल में धसते चले जाते हैं, जिसका परिणाम बहुत बड़ी त्रासदी के रूप में उनके सामने आता हैं। यह एक शास्वत सत्य हैं और जब इस बात कों मानसिक रूप से स्वीकार कर लोगे, तो आपके ह्रदय में पाप की इच्छा उत्पन्न ही नहीं होगी, साथ ही आप किसी भी कार्य कों करते समय पूरी तरह भयमुक्त रहेंगे। भययुक्त जीवन भी कोई जीवन हैं! फिर ऐसा कार्य करते ही क्यों हो, जिससे मन में हर समय डर बना रहता हैं? पापमय जीवन, भयग्रस्त जीवन तो मृत्यु से भी अधिक डरावना होता हैं।

मानवता समाप्त होती जा रही हैं, लोगों में माधूयर्ता, सरसता व परोपकारी भाव समाप्त होते जा रहे हैं। पहले सभी में परोपकारीभाव थे, आपसी प्रेमभाव था, जीवन में मधुरता थी, लेकिन आज इतना पतन हुआ हैं कि मनुष्य का विवेक मर चुका हैं और जब व्यक्ति विवेकहीन होता जाता हैं, तो उसके सोचने-समझने की शक्ति नष्ट हो जाती हैं। किसी पागल के क्रियाकलापों कों देखकर आप उसके पास जाना भी पसंद नहीं करते हैं। क्या कभी यह सोचा हैं कि उसी के समकक्ष आप भी पहुंचते जा रहे हैं?।

परमात्मा नें संपूर्ण देवी सम्पतियां तो आपके अंदर भर दी हैं। क्या उस संपत्ति कों कभी ढूढ़ने का प्रयास किया हैं? केवल भौतिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते चले जा रहे हो और कामविकार नें अंधा बना दिया हैं। इससे क्या मिल रहा हैं? “क्षणिक इन्द्रियसुख और विकारग्रस्त जीवन”। क्या आपके अंदर सरलता, विनम्रता, करुणा, ममता, दया, वात्सलय का भाव हैं? क्या कभी दूसरों के दुःख से दुःखी होते हो? यदि आपके अंदर सरलता, विनम्रता, करुणा, ममता, दया, वात्सलय का भाव नहीं हैं, तो इन्हे समाहित कर लो, जीवन सुधर जायेगा। शत्रु बाहर नहीं, बल्कि बिकारों के रूप में आपके अंदर हैं। जब तक अपने अंदर के शत्रु कों नहीं मरोगे, बाहर के शत्रुओं से मुकाबला नहीं कर सकते।

कर्म ही नहीं, तुम्हारे विचारों का भी लेखा-जोखा माता आदिशक्ति जगतजननी जगदम्बा के पास हैं। आज जो धन गलत रास्ते से आ रहा  होगा, तो उसका उपभोग करके तुम पतन के रही बन चुके हो, एक न एक दिन आपके बच्चे भी पतन के रास्ते पर अवश्य जायेंगे। यदि यें बातें आपके मनमस्तिष्क में बैठ जाएं। “माँ” का यदि सच्चा भक्त बनना हैं तो एक बार संकल्प लो कि विकारग्रस्त जीवन नहीं जियोगे।

एक पल अपने अवगुणों पर विचार करो कि कोई अवगुण आपको स्पर्श तो नहीं कर रहा हैं और निश्चय करो कि मैं एक भी अवगुण कों अपने अंदर प्रवेश नहीं करने दूँगा। एक बार सोचो कि मुझे “माँ” का सच्चा भक्त बनना हैं। मन कों निर्मल बनाकर रखो, विकारों कों हटाकर देखों, प्रकाशित हो उठोगे। एक बच्चा जब जन्म लेता हैं, तो उसके मुख से “माँ” शब्द की ध्वनि निकलती हैं। इसलिए गुरुदेव भगवान श्री शक्तिपुत्र जी महाराज नें “माँ” और “ॐ” बीजमन्त्र दियें हैं। इनका नित्यप्रति उच्चारण तो करो, समस्त विकार दूर होते चले जायेंगे। आहार, विचार, व्यवहार के प्रति सजग रहो। इन तीनों कों साध लो। आहार कों शुद्ध, सात्विक बना लो। क्या अच्छा हैं और क्या बुरा हैं, इस पर ध्यान दो। पहले लोग शरीर कों पुष्ट बनाने के लिए भोजन करते थे, लेकिन आज जीभ के स्वाद के लिए भोजन किया जाता हैं। विचार भी सात्विक होने चाहिए। अच्छा सोचो और उसी सोच के अनुरूप कार्य करो।

सभी कों हिन्दू नववर्ष की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें माँ आदिशक्ति जगतजननी जगदम्बा की कृपा यू ही बनी रहे।

(संकलनकर्ता- आशुतोष द्विवेदी, संपादक शक्ति न्यूज)

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